अब लालू मनाएंगे कोप भवन में गए नीतीश को, कांग्रेस को ही उल्टा पड़ गया खुद का प्लान ‘MRC’

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पटना: तीन राज्यों में कांग्रेस की करारी हार ने उसकी हालत बिगाड़ दी है। हाल ये है कि विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A की अगुआ बनी कांग्रेस की अब कोई सुनने को तैयार नहीं है। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने न सिर्फ अपनी फजीहत कराई, बल्कि सहयोगी दलों की उपेक्षा भी की है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ तो कांग्रेस के हाथ से निकल ही गया, मध्य प्रदेश की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया। कांग्रेस को यकीन था कि राजस्थान की रवायत टूटेगी और मध्य प्रदेश में उसकी वापसी होगी। छत्तीसगढ़ तो अपना है ही। पर, ऐसा कुछ नहीं हुआ।

कांग्रेस की योजना फेल हो गई
कांग्रेस ने बिहार के सीएम नीतीश कुमार के नेतृत्व में जून से शुरू हुई विपक्षी एकता की कमान बाद में अपने हाथ में ले ली थी। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम के विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद कांग्रेस ने गठबंधन की गतिविधियां रोक दीं। इस पर नीतीश कुमार ने यह कह कर नाराजगी जताई कि कांग्रेस को विपक्षी एकता नहीं, बल्कि विधानसभा चुनावों की पड़ी है। कांग्रेस की योजना थी कि पांच राज्यों के चुनाव परिणाम अगर उसके अनुकूल आए तो सीटों के बंटवारे में वह अपने सहयोगियों को काबू में रख पाएगी। पर, ऐसा हो नहीं पाया। अब कांग्रेस की स्थिति ‘बेचारी’ की बन गई है।

पड़ गई है बिखराव की बुनियाद
सच कहें तो जिस तरह के तेवर ममता बनर्जी और अखिलेश ने दिखाए हैं, उसकी आशंका तो उसी दिन से दिखने लगी थी, जब मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव सीटों का तालमेल नहीं होने से खफा होकर अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए थे। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने भी अपने उम्मीदवारों उतारे तो अरविंद केजरीवाल कैसे पीछे रहते। उन्होंने भी धुआंधार रैलियां कर अपने उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार किए। कांग्रेस की दुर्गति सिर्फ भाजपा ने नहीं की, बल्कि गैर कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों के उम्मीदवारों की भी थोड़ी-बहुत भूमिका इसमें थी।

पहले हिस्सा बांटो, फिर बैठक

विधानसभा चुनावों के परिणाम प्रतिकूल आते ही कांग्रेस को विपक्षी एकता की बात दिमाग में आई। आनन-फानन 6 दिसंबर को कांग्रेस ने विपक्षी गठबंधन में शामिल 28 विपक्षी दलों की बैठक बुला दी। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने न्यौते पठाने शुरू किए। इसके साथ ही विपक्षी दलों के नेताओं के मन का भंड़ास सामने आने लगा। सबसे पहले उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा कि बैठक तब तक न हो, जब तक सीटों का बंटावार न हो जाए। पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने भी अखिलेश यादव के सुर में ही सुर मिला दिया। इधर विपक्षी एकता के सूत्रधार नीतीश कुमार बीमार पड़ गए। हालांकि 5 दिसंबर को उन्होंने कैबिनेट की बैठक की। बैठक 6 दिसंबर को होनी थी।

नीतीश साथियों को साधते हैं

नीतीश कुमार की बात करें तो उनकी सबसे बड़ी सियासी खासियत यह रही है कि उन्हें अपने साथियों को साधने आता है। यह सभी जानते हैं कि नीतीश कुमार को बिहार की जनता ने कभी अकेले सरकार बनाने का बहुमत नहीं दिया, लेकिन 2005 से वे लगातार बिहार के सीएम बने हुए हैं। हां, इसके लिए उन्हें पाला बदलने वाले नेता का रूप भी धरना पड़ा है। अपने 18 साल के शासन में वे अधिकतर समय बीजेपी के साथ रहे तो दूसरी बार आरजेडी के संगी बने हैं। इसलिए यह यकीन है कि नीतीश कुमार कांग्रेस को भी साधने में पीछे नहीं रहेंगे।

नीतीश ने सब कुछ त्याग दिया

सैद्धांतिक तौर पर ही सही, विपक्षी एकता के लिए नीतीश ने बड़ा त्याग किया है। सबसे पहले उन्होंने 2025 में बिहार की कमान आरजेडी नेता और डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव को सौंप देने का ऐलान किया तो बाद में पीएम पद की रेस से बाहर रहने की खुली घोषणा भी कर दी। भाग-दौड़ कर विपक्षी दलों को एक मंच पर बिठाने का काम भी नीतीश ने ही पहली बार किया। कांग्रेस ने बाद में विपक्षी एकता की कमान अपने हाथ में ले ली और नीतीश कुमार को घटक दल के एक सामान्य नेता के रूप में एहसास कराना शुरू किया।

कांग्रेस को पाठ पढ़ाएंगे नीतीश

नीतीश कुमार के बारे में माना जाता है कि वे कब कौन-सी चाल चलेंगे, उनके करीबियों को भी पता नहीं होता। शायद कांग्रेस की चालाकी वे समझ गए थे। इसलिए बार-बार विपक्षी एकता के प्रयास में कांग्रेस को सुस्ती के लिए कोस रहे थे। इस बीच बिहार में कांग्रेस की एक विधायक ने नीतीश की नीतियों पर लोकसभा का चुनाव लड़ने की सलाह दे डाली। नीतीश की तारीफ करते समय विधायक यह भूल गईं कि वे जिस पार्टी की नेता हैं, उसके आलाकमान नीतीश कुमार नहीं हैं। नीतीश ने बीमारी की वजह से 6 दिसंबर की बैठक में जाने से मना किया तो बैठक ही टाल दी गई। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की मानें तो बैठक अब 17 दिसंबर को होगी और उनके दावे पर यकीन करें तो सभी 28 विपक्षी दलों के नेता बैठक में जरूर शामिल होंगे। लालू ने तो पहले ही कह दिया है कि नीतीश से मुकाबले में कोई नहीं है। जेडीयू ने भी अब खुल कर यह कहना शुरू कर दिया है कि नीतीश के चेहरे पर ही लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहिए। नीतीश ने खुद खामोशी ओढ़ ली है। यानी रूठने-मनाने का दौर आने वाला है।

रूठते-मानते रहे हैं नीतीश

अपना काम निकाने के लिए नीतीश अक्सर रूठ जाते हैं और अक्सर खामोशी ओढ़ लेते हैं। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी से कम महज 43 सीटें जेडीयू को मिलीं तो नीतीश रूठ गए थे। उनके रूठने की मूल वजह तो चिराग पासवान के प्रति नाराजगी थी, लेकिन उनका मानना था कि बीजेपी की शह पर ही चिराग ने उनके साथ खेल किया। बाद में मान-मनौवल हुआ और वे इनकार के बावजूद सीएम बनने को तैयार हो गए। इस बार भी भले वे कह रहे हों कि उन्हें पीएम नहीं बनना, पर सच यही है कि वे मौके का इंतजार कर रहे हैं कि उनके नाम का प्रस्ताव दूसरे दें। थोड़ी ना-नुकुर के बाद वे राजी तो हो ही जाएंगे।

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