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टीचर बना फटीचर!

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टीचर बना फटीचर!

―अनिल अयान

एक जमाना था जब गुरुजी, आचार्य जी और शिक्षकों का समाज में बहुत सम्मान हुआ करता था, आज के समय पर यदि अपमान ना हो तो वही शिक्षक के लिए सबसे बड़ा सम्मान है। आजकल के शिक्षक यानी की पढ़ें लिखे गुलाम, एजूकेशनल स्लेव, जिनके पास कहने को डिग्रियों की लम्बी पूँछ है पर कोई पूछ-परख नहीं है। सरकार शिक्षक बनने नहीं दे रही, और शिक्षा महाविद्यालयों में सामान्य नागरिक को शिक्षा देने की ट्रेनिंग पे ट्रेनिंग दिए ही जा रही है। ऐसा लगता है कि फौजी तैयार है पर युद्ध में सरकार की अनुमति नहीं है। हमारी सरकार ने तो वैसे भी शिक्षकों को फटीचर बना दिया है। शिक्षक दिवस जैसे पहले हुआ करते थे अव वैसे नहीं रहे, शिक्षक, शिक्षक ही नहीं रहा तो शिक्षक दिवस कैसा गुरू?


गुरू का उपयोग चालाक मानव के लिए होने लगा :―

गुरू का उपयोग चालाक मानव के लिए होने लगा। मास्टर साहब को मॉस्टरमाइन्ड में बदल दिया गया;अपराध जगत का सबसे बड़ा तमगा यही है, सरकारों ने अध्यापक को शिक्षाकर्मियों, संविदा शिक्षकों और शिक्षामित्रों और भी न जाने किस नाम से पुकारने लगी। यहां नेताओं को पेंशन मिल जाती है शिक्षकों को भूँजी- भाँग भी नसीब नहीं। शिक्षकों की स्थिति पे शिक्षक ही शर्मिंदा हो गया। सबके लिए योजनाएं हैं शिक्षकों के लिए कोई योजना नहीं है।

शिक्षक से बेहतर तो काम वाली बाई और स्वीपर है :―

जिला शिक्षा अधिकारी सरकारी स्कूलों के लिए उत्तरदायी हैं। प्रायवेट स्कूलों में टीचर्स को ऐसे पाला जा रहा है कि ना वो मरे न मोटाए। प्राइवेट शिक्षक से बेहतर तो काम वाली बाई और स्वीपर है जिसका पैसा अगर कट जाए तो दस गालियां देकर काम छोड़ दें। यहाँ तो शिक्षकों का काट कर वेतन मिलता है। उसमें में छुट्टी अगर लिए तो लग गई लीव विदाउट पे।

सरकार ने वैसे भी कोचिंग सेंटरों की खटिया खड़ी कर रखी है :―

सरकार ने वैसे भी कोचिंग सेंटरों की खटिया खड़ी कर रखी है। पिछले कोरोना काल से शिक्षक बने कोचिंग टीचर्स कहीं पानी मा।गने लायक नहीं बचे। ऑनलाइन क्लास तो शिक्षकों को सर्कस का शेर बना दिया है। इससे घोर बेइज्जती शिक्षकों की कभी नहीं देखा मैंने। सारे बच्चे और पैरेंट्स शिक्षकों को लुल्ल समझ कर रखे हुए हैं, और खुद को ज्ञान से फुल बने बैठे हैं।

शिक्षक के लिए ये ऑनलाइन क्लास सबसे बड़ी यानि की कालापानी की सजा है:―

शिक्षक के लिए ये ऑनलाइन क्लास सबसे बड़ी यानि की कालापानी की सजा है। शिक्षक इससे ज्यादा बेइज्जत कभी न महसूस किया होगा। सरकार और कई स्कूल तो क्लास में भी पढ़वाते है और ऑनलाइन भी मतलब शिक्षक को पूरी तरह से तवायफ बना दिए। ऑनलाइन भी मनोरंजन और ऑफलाइन भी मनोरंजन करो। नहीं तो धमकी वेतन न मिलेगा वो भी आधा वाला वेतन। मैंने ऐसे बहुत से शिक्षक देखें जिनको घर में बिठा दिया गया क्योंकि वो ऑनलाइन में बच्चों का मनोरंजन नहीं कर पा रहे थे पर क्लास में वो बहुत अच्छे शिक्षक थे। यह दुर्दशा नहीं तो क्या सम्मान है!?

शिक्षकों को क्या मिल रहा है!?

बच्चों को ज्ञान मिल रहा, स्कूल को फीस मिल रही है आधी अधूरी या अंत तक पूरी, पैरेंट्स को बच्चे किताबों से घिरे मिल रहे हैं पर शिक्षकों को क्या मिल रहा है। आदर्शवादी व्यवस्था में शहादत। आधा वेतन दोगुना काम, ना वेतन वृद्धि, ना छुट्टी, काटा गया वेतन भी मिलने की उम्मीद जो कभी पूरी नहीं होती। बहुत से शिक्षक ऐसे हैं जिन्होने समय रहते आपदा में अवसर तलाश कर लिया, कोई बिजनेस करने लगा, कोई स्टार्ट अप शुरू कर दिया, किसी ने कोई न कोई काम करना शुरू कर दिया।

सामान्य शिक्षक संघर्ष कर सकता है भूखों मर सकता है:

इन सबके बीच शिक्षकों ने दिखा दिया कि वो भूतपूर्व शिक्षक तो हैं साथ ही साथ अभूतपूर्व व्यक्ति भी है। शिक्षक दिवस की उन अभूतपूर्व व्यक्तित्वों को भी नमन करता हूँ। आपने हर व्यक्ति कामगार व्यवसायियों का संगठन देखा होगा। यहाँ तक कि विद्यालयों का भी संगठन बने हैं, जिसको जब देखो धरना प्रदर्शन और हड़ताल करते रहते हैं।

शिक्षक इतना सम्भ्रान्त किस्म का व्यक्ति हैं कि वो कभी संगठन में नहीं जुड़ा, सरकारी शिक्षक हो सकता है कि जुड़े ही हों। सामान्य शिक्षक संघर्ष कर सकता है भूखों मर सकता है पर अपनी इमेज हड़ताल और धरना करके खराब नहीं कर सकता है। ऐसे दृढ़ संकल्प लिये शिक्षक सम्मान के पात्र हैं।

शिक्षकों का कोई माई-बाप नहीं है:―

जब डॉ. राधाकृष्णन जी ने शिक्षक समुदाय को देखा और उनको सम्मान दिया तब शिक्षक की दशा और आज के समय में शिक्षक की दुर्दशा के बीच का अंतर सभी को साफ दिखता है।
शिक्षकों का कोई माई-बाप नहीं है, जो माई-बाप बने बैठे हैं वो बगलें झाँक रहे हैं, सफाई देते फिर रहे हैं। मैं ऐसे विद्यालयों से भी परिचित हूँ जहाँ शिक्षकों को प्रिंसिपल ऑफिस में अपमान ही मिलता है। विद्यालय अभिभावकों की सुनते हैं और शिक्षकों की भगवान भी नहीं सुनता। बहुत से अच्छे शिक्षक विद्यालय और पैरेंट्स की जिद की वजह से निकाल दिए जाते हैं।

शिक्षक के भविष्य के प्रति बात होने पर संस्थाओं के मुँह में दही जम जाता है:―

आप खुद सोचिए कि यदि यह काम इतना अच्छा है तो सरकार को समाज में इफरात शिक्षक देना चाहिए। उन्हें पेंशन और अच्छा वेतन देना चाहिए उनकी समस्याओं की सुनवाई होना चाहिए। यदि यह काम अच्छा नहीं है सरकार को स्कूल बंद करके टीचिंग ऐप्स से बच्चों को शिक्षा देना चाहिए। पर आज शिक्षा बाँटने शिक्षक वाला खुद अपनी बुनियादी मांग पूरा करने के लिए संघर्षरत और मांगने वालों की कतार में खड़ा है।
शिक्षको के लिए आदर्शवादी बातें बहुत की जाती है पर उसके भविष्य के प्रति बात होने पर संस्थाओं के मुँह में दही जम जाता है।

शिक्षक दिवस में सभी शिक्षक याद किये जा सकते हैं चाहे वो गुरुकुल के हों, चाहें विद्यालय के हों? चाहें महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के हों,पर एक विभाजन रेखा है सरकारी और निजी क्षेत्र जिसके चलते शिक्षक समुदाय का भी विभाजन हो जाता है। जैसे बीपीएल गरीबी रेखा के नीचे और एपीएल ग़रीबी रेखा के ऊपर

 

पढ़ें-लिखे गुलामों को उन्हीं के जैसे एक गुलाम की तरह से हैप्पी टीचर्स डे:―

यह दिवस डॉ. राधाकृष्णन जी का जन्मदिन हो सकता है पर शिक्षक दिवस नहीं हो सकता है। आज हजारों स्कूल बंद हो गए, बच्चों की पढ़ाई बंद हो गई, शिक्षक समाप्त हो गए। इस सबके बीच शिक्षकों दिवस में हैप्पी टीचर्स डे बोलना इस शिक्षण सेवा का घोर अपमान नहीं तो और क्या है। इन परिस्थितियों के बीच में जो शिक्षक डार्विन के विकासवाद को अपनाने का जोखिम उठा रहे हैं। वो बधाई के पात्र हैं। वो शिक्षक भी बधाई के पात्र हैं, जिनके लिए शिक्षक दिवस मात्र तारीख है! तारीफ नहीं; जिनके विद्यालय में यह दिन मनाया ही नहीं जाता। कुल मिलाकर कर टीचर से फटीचर बने जीवधारियों को और पढ़ें लिखे गुलामों को उन्हीं के जैसे एक गुलाम की तरह से हैप्पी टीचर्स डे।

―अनिल अयान

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