बोनमेरो ट्रांसप्लांट नहीं था संभव तो एटीजी थैरेपी से दिया नया जीवन

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इंदौर। शहर के शासकीय अस्पतालों में अब निजी अस्पतालों से भी बेहतर सुविधाएं मिलने लगी हैं। सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल में आया एप्लास्टिक एनिमिया से पीड़ित युवक का बोनमेरो ट्रांसप्लांट संभव नहीं था। ऐसे में डाक्टरों ने तीन माह तक देखरेख की और एटीजी (एंटी थाइमोसाइट ग्लोब्युलिन) थैरेपी से उसका इलाज किया। अब वह स्वस्थ है।

एप्लास्टिक एनिमिया से पीड़ित

क्लिनिकल हेमेटोलोजिस्ट डा. अक्षय लाहोटी ने बताया कि गुना निवासी 23 वर्षीय जतिन ओझा के मुंह, नाक, कान से करीब आठ माह से खून आ रहा था। त्वचा पर भी खून के थक्के बन गए थे। वह पहले भोपाल और दिल्ली भी इलाज के लिए जा चुका था। वहां से इंदौर आया। बोनमेरो की जांच के बाद पता चला कि यह एप्लास्टिक एनिमिया से पीड़ित है। मरीज पिछले तीन-चार माह से यहां भर्ती है, हमने एटीजी थैरेपी के माध्यम से उसका इलाज किया। यह थैरेपी शासकीय अस्पताल में कम ही होती है।

एटीजी थैरेपी के माध्यम से उपचार

डाक्टरों ने दावा किया है कि प्रदेश के शासकीय अस्पताल में पहली बार ही एटीजी थैरेपी के माध्यम से उपचार किया गया है। इस थैरेपी में डीन डा. संजय दीक्षित, अधीक्षक डा. सुमित शुक्ला, डा. राहुल भार्गव, डा. सुधीर कटारिया आदि का सहयोग रहा। डाक्टरों के सामने थी यह चुनौती मरीज बीमारी के काफी समय बाद यहां आया था।

इसमें सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि थैरेपी के लिए मरीज और परिवार के लोगों को समझाना। पहली बार यह थैरेपी यहां दी जा रही थी। थैरेपी के लिए इंजेक्शन बाहर मेडिकल से खरीदते हैं। उसकी कीमत 12-13 हजार रुपये हैं। मरीज की आर्थिक स्थिति सही नहीं होने के कारण सरकार की योजना से इसे सात हजार रुपये में खरीदा गया।

 

क्या होता है एटीजीएंटी थाइमोसाइट ग्लोब्युलिन (एटीजी)

 

ह्यूमन सेल और घोड़े या खरगोश से प्राप्त एंटीबाडी का एक सम्मिश्रण होता है। इसका उपयोग अंग प्रत्यारोपण के उपचार और अप्लास्टिक एनीमिया के उपचार में किया जाता है। बोनमेरो फेलियर के मरीज को घोड़े का एटीजी दिया जाता है। इसमें ब्लड कंपोनेंट के साथ सहायक ब्लड वाइटल्स, रक्त मापदंडों की निगरानी की जाती है।

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