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शिक्षक दिवस पर माननीय उपराष्ट्रपति का सन्देश

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शिक्षक दिवस पर माननीय उपराष्ट्रपति का सन्देश
अपने गुरुजनों का सम्मान करें तथा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को अपनाएं

“एक शिक्षक अतीत का ज्ञान देता है, वर्तमान को प्रकट कराता है और भविष्य का निर्माण करता है” भूतपूर्व राष्ट्रपति, चिंतक-विचारक, स्वर्गीय प्रोफेसर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की यह सारगर्भित उक्ति, हमारे जीवन को आकार देने और भविष्य में राष्ट्र की दिशा तय करने में, हमारे गुरुजनों के महत्वपूर्ण योगदान का सटीक विश्लेषण करती है।

आज शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर जब हम राष्ट्र निर्माण में श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के बहुमूल्य योगदान को याद करते हैं, तो उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग का अनुसरण करना ही भारत के इस महान सपूत के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। श्री राधाकृष्णन के जीवन का बड़ा हिस्सा शिक्षा और शिक्षण को समर्पित रहा था। उनका कहना था कि देश के सबसे मेधावी मानस को शिक्षक बनना चाहिए।

हम में से हर किसी के जीवन में हमारे करियर के निर्माण का श्रेय, काफी हद तक हमारे शिक्षकों के मार्गदर्शन को ही जाता है। आज जब मैं अपने शैक्षणिक और राजनैतिक करियर को दिशा देने वाले शिक्षकों और गुरुजनों को याद करता हूं तो उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान से शीश स्वत: ही विनम्रता से झुक जाता है।

हम सब जानते हैं कि प्राचीन काल में, शिक्षा और ज्ञान के केंद्र के रूप में भारत की प्रतिष्ठा थी। हम विश्वगुरु के रूप में विख्यात थे जहां विश्व के कोने कोने से विभिन्न विधाओं के विद्यार्थी ज्ञानार्जन के लिए आते थे। नए ज्ञान, नई विद्या, नए शिल्प को सीखने, अपनी बौद्धिक प्रतिभा को परखने और दिखाने, अपने ज्ञान क्षितिज का विस्तार करने, विश्व भर से प्रकांड पंडित यहां आते थे। चरक संहिता, आर्यभट्टीय, अर्थशास्त्र, शुक्रनितिसार, पतंजलि के योगसूत्र , प्राचीन भारत की विशाल ज्ञान निधि के ये कुछ दैदीप्यमान उदाहरण हैं।

उस समय की शिक्षा पद्धति औपचारिक और अनौपचारिक दोनों ही थी जिसमें गुरुकुल, पाठशालाएं और यहां तक कि स्थानीय मंदिर भी व्यक्ति के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

इन सबका केंद्र थी वह अद्भुत गुरु-शिष्य परंपरा जिसमें एक प्रबुद्ध सात्विक गुरु, जीवन के कुछ मूलभूत संस्कारों, अनुभवों और आचरण के साथ विद्या और ज्ञान की विशाल निधि को अपने जिज्ञासु, आज्ञाकारी और समर्पित शिष्य को सौंप देता था।

इस प्रकार गुरु और शिष्यों की एक लम्बी ज्ञान परंपरा अनवरत चलती रहती थी जिसमें विद्या और ज्ञान का यह सहज सुगम संचार ही गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखता था। गुरु और शिष्य के बीच का रिश्ता मात्र शिक्षक और विद्यार्थी का ही नहीं होता था बल्कि उससे कहीं अधिक प्रगाढ़ होता था जिसमें शिष्य गुरु के परिवार का अभिन्न भाग होता था तथा निःस्वार्थ भाव से गुरु की सेवा करता। गुरु की पत्नी, शिष्य की स्नेहिल गुरु मां होती थी।

हमारे सनातन संस्कारों में शिष्य अपने गुरुजनों को सदैव प्रतिष्ठा और सम्मान देते रहे हैं। गुरु शिष्य को जन्म -मृत्यु के चक्र से निकलने और अभीष्ट ज्ञान दे कर, जीवन की अंतिम मुक्ति, मोक्ष, प्राप्त करने में भी सहायता करते थे। इस प्रकार एक शिष्य के लिए उसका गुरु दृष्टा, तत्व- विचारक, मार्गदर्शक और उसके जीवन का आदर्श हुआ करता था। एक बड़ा ही प्रचलित श्लोक है ” गुरु: ब्रह्मा, गुरु: विष्णु, गुरु: देवो महेश्वर:, गुरु: साक्षात परब्रह्म : तस्मै श्री गुरुवे नमः”, यह श्लोक अपने आप में प्राचीन भारत के शिक्षा शास्त्र और शिक्षा पद्धति का सरल सटीक निरूपण करता है।

प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्यों को विभिन्न विधाओं में शिक्षा प्रदान करते थे, धर्मशास्त्रों से ले कर राजनीति शास्त्र, आयुर्वेद से लेकर दर्शन, द्वंद्व युद्ध और सैन्य प्रशिक्षण से लेकर ज्योतिष शास्त्र तक। यह शिक्षा की एक समग्र प्रणाली थी जिसमें शिष्य के चहुंमुखी विकास पर बल दिया जाता था, उसके आध्यात्मिक, भौतिक और बौद्धिक उत्कर्ष पर बल दिया जाता था। शिष्य जीवन की किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए कौशल की दृष्टि से तथा नैतिक रूप से भी तैयार रहते थे।

हमारे ग्रंथों में महान प्रतिष्ठित गुरुओं और उनके प्रसिद्ध शिष्यों के ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जैसे ऋषि विश्वामित्र और भगवान राम,गुरु संदीपनी और भगवान कृष्ण, गुरु द्रोणाचार्य और अर्जुन, जो विद्या देने और विद्या को ग्रहण करने की आदर्श पद्धति को परिभाषित करते हैं।

 

हमें अपनी इस परंपरा को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखना चाहिए, उसे बढ़ाना चाहिए। समय आ गया है कि भारत एक बार पुनः विश्वगुरु की अपनी प्रतिष्ठा को हासिल करे तथा ज्ञान, अनुसंधान और इन्नोवेशन के केंद्र के रूप में विश्व में स्थापित हो। मुझे हर्ष है कि नई शिक्षा नीति 2020 का उद्देश्य पूरे शिक्षा तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन करना है और भारतीय परंपराओं और संस्कारों के आधार पर ही शिक्षा प्रणाली को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना है।

 

 

नई शिक्षा नीति के अनुसार, शिक्षा प्रणाली में इन मूलभूत सुधारों के केंद्र में शिक्षक ही होंगे। शिक्षा नीति का उद्देश्य है कि शिक्षकों को समाज के हर स्तर पर, एक आवश्यक सदस्य के रूप में सम्मानित स्थान मिले। आखिर शिक्षक ही तो नागरिकों की भावी पीढ़ी को गढ़ते हैं।

 

 

मुझे विश्वास है कि नई शिक्षा नीति वह परिवेश उपलब्ध करा सकेगी जिसमें शिक्षक और शिष्य दोनों ही अपनी क्षमता अनुसार उपलब्धियां हासिल कर सकेंगे और हर क्षेत्र में मानवता के विकास में योगदान दे सकेंगे। अंत में मैं महात्मा गांधी की विचारों को उद्धृत करना चाहूंगा, उन्होंने कहा था “शिक्षा का अर्थ मैं समझता हूं कि बच्चे और मनुष्य के, शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक, सभी आयामों को बेहतरीन तरीके से निखारना।”

― मान. वेकैंया नायडू
(उपराष्ट्रपति जी ,भारत सरकार)

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