Home Main

सरकारी हिन्दी की ऋतु आई, सखि!

254
0
सरकारी हिन्दी की ऋतु आई, सखि!
~ प्रेम जनमेजय

दोनो सखियाँ इन दिनों काम के बोझ की मारी हैं। दोनो सरकारी नौकरी में हैं। दोनो सखियाँ राजभाषा विभाग की शोभा बढ़ा रही हैं। जो गति सरकार की है वही गति इनके काम की है। सरकारें विज्ञापनों में काम करती दिखाई देती हैं और इनकी हिन्दी भी विज्ञापित होती रहती है।वैसे तो इनकी सीट पर काम आता नहीं पर जब आता है तो चुनावकाल में आश्वासनों की तरह आता है। इन दिनों देश में आर्थिक व्यवस्था का स्तर चाहे न बढ़ रहा हो पर जलस्तर बढ़ रहा है। मुम्बई में गणेश का विर्सजन करने वालें अपने विर्सजन से बचने के उपाय ढूँढ़ रहे हैं।

दोनों सखियाँ भी बढ़े हुए काम के जलस्तर से बचने के लिए काॅफी शाॅप में उपाय ढूँढ़ रही हैं।

आई डोंट नो हाउ टू मैनेज दिस हिंदी दिवस,यार! यू नो,छह महीने पहले ट्रांसफर हुआ है एंड बाॅस ने ऑडर दे दिया है…‘‘

– डोंट वरी यार! मेरे पास पूरी लिस्ट हिन्दी स्काॅलर्स की। किसी भी बड़े स्काॅलर को काॅनटैक्ट कर लें, तीन-चार नाम वो बता देगा।
क्या टाॅपिक होना चाहिए?ये भी वो बता देगा।

कविता, डिबेट, हैंडराईटिंग का कम्पटीशन रख। भूल गई , प्राईमरी तक स्कूल में जो कम्पटीशन होते थे।
हैवी एक्स्पेंडीचर का बजट बना। बाहर से आने वालों को बढ़िया टी ए और डी ए दे, कम्पटीटर्स को महँगे प्राईजेस दे, बढ़िया खाना-पीना रख। लास्ट डे प्राईज डिस्ट्रीब्यूशन पर बाॅस को बुला ले। बाॅस के हिंदी प्रेम पर खूब मक्खन लगा। चीफ गेस्ट को पहले ही हैवी पेमैंट कर देना। वो जब बोलेगा तो तेरे कसीदे कढ़ेगा । सिंपल।’’

 

– ओह यार दिज इज सो सिम्पल। मैं तो सोच रही थी कि डिफिकल्ट हिंदी पर प्रोग्राम करना भी डिफिकल्ट होगा, बट तूने तो सो सिंपल कर दिया।’’

दोनो सखियाँ गाने लगीं- नाच सखि, सरकारी हिंदी दिवस ऋतु आई!

हिन्दी दिवस आता है तो मुझे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबन्ध याद आता है-

आम फिर बौरा गए। दो सखियन की वार्ता सुन मुझे फिर याद आया। द्विवेदी जी लिखते हैं- बसन्त पञ्चमी में अभी देर है, पर आम अभी से बौरा गए। हर साल ही मेरी आँखें इन्हें खोजती हैं। बचपन में सुना था कि बसन्त पञ्चमी के पहले अगर आम्रमञ्जरी दिख जाय तो उसे हथेली पर रगड़ लेना चाहिए, क्योंकि ऐसी हथेली साल भर तक बिच्छू के जहर को आसानी से उतार देती है।’’

मुझे पूर्ण विश्वास है कि इन सखियों को भी साल भर हिन्दी का जहर असर नहीं करेगा। इन सखियों को ही क्या, जो भी हिन्दी दिवस, सप्ताह, पखवाड़ा आदि को रगड़ता है, उसे वर्ष भर तक हिन्दी का जहर असर नहीं करता है।

हिन्दी दिवस अभियान चालू है। डेंगू अभियान चालू है।स्वच्छता अभियान भी चालू है। और सब चालू हैं। सब अभियान चला रहे हैं, संस्कार कोई नहीं दे रहा। अभियान चलाने से पब्लिसिटी मिलती है,वोट मिलता है।

रोज हाथ में झाड़ू पकड़ सफाई करने वाले का फोटू नहीं छपता है, उसे तो गालियाँ मिलती हैं। फोटू तो अभियान वाले का छपता है। जो प्रतिदिन सफाई का संस्कार देता है वो अछूत होता है।

 

 

पब्लिक स्कूल में हिन्दी डे अभियान चालू है। हिन्दी टीचर क्योंकि हिन्दी टीचर है इसलिए प्रिंसिपल रूम में घुसते हुए डरती है। अंग्रेजी की टीचर प्रिंसिपल से कुर्सी पर बैठकर बात करती हैं पर हिन्दीवाली खड़े-खड़े बात करने को अभिशप्त है।

आज भी हिन्दी टीचर ने भूत पिशाच निकट नहीं आए, मन्त्र का जाप करते हुए प्रिंसिपल रूम में प्रवेश किया।प्रिंसिंपल ने भयभीत हिन्दी को अपने अंंग्रेजी चश्मे से झाँँका और पूछा-

यस सुनीता, से क्विक्ली वाट्स द इम्पोर्टेन्ट इश्यू, यू हैव टू डिस्कस। आई एम वैरी बिजी…

– मैडम स्कूल में हिंदी डे सेलिब्रेट करना है।

-व्हाॅट! हिंदी डे सेलिब्रेशन!’ प्रिंसिपल पर

सर्जिकल अटैक जैसा हुआ।‘ एंड यू से दैट दिज इज एन वैरी इम्पोर्टेंट मैटर! यू हिन्दीवालाज न…’’

— साॅरी मैडम! वो एजुकेशन डिपाॅर्टमेन्ट से ऑर्डर आया है। इट्स मस्ट…’’

– दिस ग्वर्नमेंट … हम स्टूडेंट को वल्र्ड से कंपीट कराना चाहते हैं और ये बिहार से कराना चाहते हैं।डू इट…गर्वनमेंट आर्डर है। बट बी केयरफुल सुनीता हिंडी का ये वायरेस स्कूल में फैलना नही चाहिए। एंड माईंड इट किसी पैरेन्ट्स का कम्पलेंट नहीं आना चाहिए कि उसके चाईल्ड को हिन्दी के लिए कम्पेल किया गया। किसी ने मैनेजमेंट को कंप्लेंट कर दिया तो आई विल नाॅट बी एबल टू सेव योर जाॅब।

मैं तुम्हारी नौकरी नहीं बचा पाऊँगी –

मैं हिंडी में बोल रही हूं कि समझो और वार्न हो जाओ।’’

सुनीता को तुलसी याद आ गए। लंका में रावण विरोधियों की स्थिति दाँतो के बीच जिह्वा-सी होती थी और पब्लिक स्कूल में हिंदी की स्थिति!!

― प्रेम जनमेजय
( व्यंग्य यात्रा के सम्पादक एवं प्रख्यात व्यंग्यकार)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here