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‘सदाबहार व्यंग्यों के तड़के वाली बापू की स्मार्ट सिटी’

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पुस्तक समीक्षा  : ‘सदाबहार व्यंग्यों के तड़के वाली बापू की स्मार्ट सिटी’

~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल 

पच्चीस व्यंग्यों के संग्रह वाली ‘बापू की स्मार्ट सिटी’ में डाॅ. प्रदीप मिश्र ने अपने आस पास के परिवेश – वस्तुस्थितियों , विसंगतियों को चित्रित किया है। सामान्य से दिखने वाले असामान्य घटनाक्रमों को कुछ उसी तरह व्यंग्य में हास्य के पुट के साथ समेटा है ; जिस प्रकार उन्होंने रसायन शास्त्र की जटिलता को अपनी अध्यापन यात्रा में सरलता के साथ पूर्ण किया है। पेशे से प्राध्यापक के रुप में सेवाएं देने‌ वाले प्रदीप मिश्र ने अपनी कई दशकों की लेखन यात्रा – साहित्य साधना एवं जीवनानुभवों , बदलते सामाजिक आर्थिक राजनैतिक परिदृश्यों एवं समाज की सूक्ष्मतम् नसों को पकड़कर उन्हें अपने व्यंग्यों के विस्तृत फलक में उतार दिया है। ‘बापू की स्मार्ट सिटी’ के रुप में उनका यह व्यंग्य संग्रह उसकी एक बानगी है।

 

‘ माँ शारदे ज्ञान दे ‘ – में शिक्षा एवं सामाजिक व्यवहार के बदलते परिदृश्यों पर गहरा तंज किया है। इसमें माता सरस्वती को सम्बोधित करते हुए कहते हैं – माँ राजनीति और अपराध ऐसे घुल मिल गए हैं कि डाकू और नेता में फ़र्क समाप्त हो गया है। ऐसा अपवाद ढूँढ़ना लगभग असम्भव है कि जिसमें कोई चोर ,नेता न हो और कोई नेता ,चोर न हो । राजनीति शास्त्र अपने नए स्वरूप में दिखने लगा है जिसे अपराध शास्त्र कहते हैं। वहीं चिकित्सा एवं व्यवसाय के घाल मेल व मुखौटों की वास्तविकता दिखलाते हुए मनुष्यता के गिरते स्तर पर तंज कसते हैं।

 

‘हरिओम परेशान है’ – में सामाजिक विकृतियों, भौंडेपन एवं पतन पर प्रश्न पूँछते हुए कहते हैं — श्रीमान क्या आप पसंद करेंगे कि आधुनिक और सभ्य भारत में भी गलियों में खुली दुकानों पर आपका लड़का और नाती शराब की चुस्कियां मारते हुए ,वेश्या के गले में बांहे डाले हुए ,जुएं के दाँव लगाते नजर आएं ? जरा बोलिए ..?

 

‘सड़क पर गाँजे की ऑफिशियल खेती ‘ – गाँजे के बैन होने पर भी उसके अवैध व्यापार, नशे को दुष्प्रभावों से लेकर ट्रैफिक पुलिस वालों के भ्रष्टाचारी गालों पर तमाचा जड़ते हुए कहते हैं – ट्रैफिक पुलिस वाले इस बात की जाँच करेंगे कि सड़क से गुजरने के दौरान आदमी की साँस तो नहीं टूटी ? साँस टूटने पर टैक्स देना होगा। टैक्स मिलने पर सरकार की आमदनी बढ़ेगी , जिससे प्रोत्साहित होकर सरकार गाँजे के पौधों के साथ ही भाँग और अफीम के पौधे भी सड़कों पर लगवाएगी।

 

‘गिरा हुआ मैं ‘ मनुष्य की मरती हुई सम्वेदनाओं एवं दिखावे पर व्यंग्य किया गया है – “ ये सारा कुछ मैं तब मानूँगा ,जब तुम्हारे गिरने की खबर के साथ लोग तुम्हारी तस्वीर पर माल्यार्पण करते हुए नजर आएंगे। – कहकर वह खुद गिरने चला गया।

 

‘ बापू की स्मार्ट सिटी’ में – स्वच्छता अभियान के पाखण्ड,नेताओं- समाजसेवियों, अधिकारियों के कचरा उठाने, दूध में मिलावट के साथ ही विविध विद्रूपताओं व नैतिक मूल्यों के पतन की दर्द भरी दास्तां को गाँधी जी के दर्पण में दिखलाते हैं। जहां यह स्पष्ट होता है कि – गाँधी एवं उनकी सीखों को वर्तमान परिदृश्य में अप्रासंगिक कर दिया गया है। और सबकुछ स्वार्थपरता एवं अमानवीयता के पाश का शिकार होता चला जा रहा है।

 

‘ बहरहाल ,अब मैं तंदुरुस्त हूँ ‘ में – ढोंगी बाबाओं के पाखण्डों का नीर क्षीर विवेचन विश्लेषण करते हुए आडम्बरों पर करारी चोट की है। ‘ क्वालिटी डेवलमेंट ‘ में – जनसंख्या विस्फोट के संकट का चित्रण करते हुए अनाथों को गोद लेने की आशा जागृत होती है‌ । ‘ बाॅर्डर लाईन पर खड़ा ईमानदार ‘ में – ईमानदारी की बदलती परिभाषा और ईमानदारी के खामियाजों पर व्यंग्य की चुटीली शैली में दृष्टिपात करते हैं। ‘ रोजगार के नए अवसर’ में – भ्रष्टाचार, आरटीओ कार्यालय- रिश्वतखोरी – दलालों के धन्धों एवं जुगतों पर हास्य के सहारे मार करते हैं। वहीं ‘ महंगाई पर सरकार के दिल की बात’ में – जनता पर असहनीय महंगाई की मार, अमीर- गरीब के बीच बनती गहरी खाई। गरीबों की दुर्दशा व सरकारों के नक्कारेपन पर तल्खी के साथ पेश आते हैं। और इतना ही नहीं नेताओं के पात्र के सहारे उन्हीं के कन्धों पर बन्दूक रखकर करारा प्रहार करते हैं।

 

‘वर्ल्ड क्लास सुदामा का सम्मान ‘ में – मित्रता के पाखण्ड व आत्मीयता पर दिखावे की लगती हुई घुन का चित्रण मिलता है। ‘ एक प्यारी सी बीमारी डायबिटीज ‘ में – भ्रष्टाचार, धनलिप्सा व महंगाई बढ़ाने के सरकारी तरीकों – कुतर्कों को मधुमेह से जोड़कर सरकार की अनीतियों पर प्रश्न चिन्ह उठाते हैं। ‘ चाचा की हवाई यात्रा ‘ में हास्य के ठेठ रंग में रंगते हुए – प्रथम हवाई यात्रा में गए व्यक्ति के मनोभावों को हास्य में ढालते हुए – तम्बाकू, गुटखा खाने व रेलवे की दुर्दशा , असामाजिक व्यवहार पर भी तुलनात्मक तंज कसा है। ‘ट्रक आया भागो’ में – शहर में पुलिस की रिश्वतखोरी के चलते नो इण्ट्री में ट्रकों के अनाधिकृत प्रवेश के कारण होने वाली मौतों पर व्यंग्य की फटकार लगाई है। ‘ चचा प्रयागराग जी’ में शहर की तासीर व मजाकिया लहजे में प्रयागराज के पूर्व प्रचलित नाम इलाहाबाद के लहजे, व मजाकिया ढंग में यात्री के मध्य बतकही है।

 

‘कबिरा तेरी झोपड़ी – दारू दुकान के पास ‘ में – सरकारों की शराब नीतियों व शराबियों की प्रवृत्ति पर अपने चिर परिचित हास्य अन्दाज में कहते हैं – ” देखो चचा दारू का शाॅप अपन मुहल्ला में ना खोलवा के एवरेस्ट की चोटी में भी खोलवा दोगे , तब भी पीने वालों का तादाद कम नहीं होगा‌।” , ‘सोहर गाने का वक्त’ में -पन्द्रह अगस्त के दिन की झाँकी व हर आम- खास के उत्साह को हरदास चाचा के रुपांतरण में ढाल दिया है। ‘ गीत गाया ईव्हीएम ने ‘ में – चुनावी समय में ईव्हीएम पर चलने वाली राजनीति पर कटाक्ष को ईव्हीएम की आपबीती के रुप में ही ढाल दिया है । ‘ पप्पू भैय्या ‘ में – समाज सेवा के वास्तविक उद्देश्य को अपने जीवन के करीबी किस्से से उठाकर हास्य के गोते में सराबोर कर देते हैं।

 

‘मेरी ईद में’ – भारतीयता के असल मायनों एवं मजहबी दीवारों की पृथकता से अलग पारस्परिक सौहार्द एवं समन्वय का रेखाचित्र है। ‘हैप्पी मदर्स डे ‘ में – वर्तमान समाज की निकृष्टता, भारतीय समाज में वृध्दों की उपेक्षा एवं वृध्दाश्रम के बढ़ते ग्राफ। सामाजिक ढोंग व बड़े बुजुर्गों की परिस्थितियों का मार्मिक उद्धाटन करते हुए व्यंग्य की आँच में आडम्बर का नकाब उतारने में सफल होते हैं।’आइए बुद्धिजीवियों को गरियाएं’ में -भारतीय विचार प्रणाली , राजनीति एवं बौद्धिक चेतना के निरन्तर ह्रास पर व्यंग्य करते हुए मूल्यों से पतित राजनीति व तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के घोर पतन की व्यंग्य से सराबोर कहानी का चलचित्र खींचते हैं।

 

‘किसानी एक नाॅन प्राॅफिटेबल इवेंट ‘ में – सरकारों की उपेक्षा, गाँव, किसान एवं किसानी को लेकर समाज की मानसिकता पर प्रहार करते हुए अपना मर्म बयाँ करते हुए कहते हैं – “ हमने गाँव छोड़ दिया शायद इसीलिए हम बे-पाँव के हो गए हैं। गाँव में बैठे किसानों की दुश्वारियां भी इसीलिए हैं कि – शहर में प्राॅफिटेबल इवेंट्स के चक्कर में हम कहते उठते हुए हैं – कौन गाँव ? कैसा गाँव?

‘वहीं ट्रेन में रात का सफर ‘ में – भारतीय रेलवे की असुविधाओं एवं यात्रियों की परेशानियों से रुबरु कराते हैं।

 

व्यंग्य का अभिप्राय ही मानव मन विसंगतियों विद्रूपताओं के प्रति झंकृति एवं यथार्थवादी विद्रोह है। जिसे डॉ. प्रदीप मिश्र की सहज सरल आम बोलचाल की भाषा में हास्य से सराबोर चुटीली शैली ने अपने उद्देश्यों को प्राप्त किया है।

इन व्यंग्यों में कहीं कहीं वाक्य विन्यास के बीच आई मात्रात्मक अशुध्दियों का अगले संस्करण में सम्पादन भी वांछनीय है। इस संग्रह के प्रत्येक व्यंग्य पाठक को अपने से बांधे रखने व उसे यह अनुभव कराने में सफल होते हैं कि – इस व्यंग्य में उसका जीवन व उसके आसपास के वातावरण का चलचित्र ही खिंचता चला जा रहा है। यह पुस्तक पठनीय एवं आम जन जीवन के मध्य की झाँकी व वर्तमान परिदृश्यों का दर्पण बनकर सबको उनका वास्तविक चेहरा दिखलाती है।

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

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प्रकाशक : BooK Clinic

मूल्य : ₹ १२०

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