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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और विजयराघवगढ़ के जननायक राजा सरजू प्रसाद सिंह

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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और विजयराघवगढ़ के जननायक राजा सरजू प्रसाद सिंह

विजयराघवगढ़ कटनी के पास बसा नगर है, इस स्थान की महत्ता यह है कि इस धरती पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का जन्म हुआ। जिनका नाम था ठाकुर सरजू प्रसाद सिंह, इस स्थान पर बने शासकीय चिकित्सालय का नाम भी इस महानायक के नाम से बना है, जब मैहर के राजा दुर्जन सिंह का निधन हुआ तब जब मैहर और विजयराघवगढ़ अलग हुआ तब विजयराघवगढ़ राजा प्रयागदत्त जी को सौंपा गया, और मैहर विशन सिंह को सौंप दिया गया।

उन्होने राघव जी की मूर्ति की स्थापना करके विजयराघव के झपावन नदी के किनारे ऐतिहासिक किले का निर्माण करवाया, इस किले का निर्माण अपने में विशेष शैली में किया गया इसकी सुरक्षा जिसकी वजह से और बढ़ जाती है, उनके पुत्र थे राजा सरजू प्रसाद सिंह जो स्वंत्रतता के महासमर में एक राजा और राज कुमार की तरह नहीं बल्कि जननायक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन की। जब राजा प्रयागदत्त की मृत्यु हो गई तब विजयराघवगढ़ में अंग्रेजों ने कोर्ट ऑफ वार्ड्स के तहत अपने कबजे में लेकर राजकुमार सरजू सिंह जी को पढ़ने के लिए बाहर भेज दिए। वापसी के बाद जब सरजू सिंह जी ने देखा कि विजयराघवगढ़ की रियासत में अंग्रेजों का अनावश्यक कब्जा बना हुआ है, तो उन्होने अपने हाथों अंग्रेजों के नुमाइंदे मीर साबिक अली को मारकर स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा दिया। अपने राजकाज की चिंता किये बिना यह बिगुल स्वतंत्रता की आग बनकर अंग्रेजों के लिए दावानल बनकर आगामी छ: से आठ महीने तक नाश का कारण बना रहा, मुरवारा के स्वतंत्रता आंदोलन में विजयराघवगढ़ का अपना अमूल्य योगदान है।

स्वातन्त्र्य वीरों के सम्पर्क में राजा सरजू प्रसाद सिंह :―

 राजा सरजू प्रसाद सिंह ― नाना साहब पेशवा, रानी लक्ष्मी बाई, राजा शंकरशाह, रानी अवन्तीबाई जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियो के संपर्क में रहे। उन्होने अपने साथियो के साथ अंग्रेजों से नियमित युद्ध किये, इन युद्धो में कैमोर भांड़ेर का स्वतंत्रता संग्राम, कटनी नदी के पास लड़ा गया युद्ध, बिलहरी के आसपास, कई युद्ध हुए, अंग्रेजों ने विजयराघवगढ़ के विद्रोह को रोकने के लिए एक तरफ से जबलपुर, दूसरी तरफ से नागौद, तीसरी तरफ से रीवा रियासतों की सेनाओं के दल बल को उपयोग किया। ताकि वो विजयराघवगढ पर अपना वर्चश्व स्थापित कर सकें।

लेकिन राजा सरजू सिंह ने अपने सूझ बूझ और युद्ध कौशल के चलते अंग्रेजों को कई बार परास्त किया। उस समय विजयराघव गढ़ में आधुनिक हथियारों की कमी थी, तब भी वो और पूरा विजयराघवगढ़ अपने स्वतंत्रता और अस्मिता को बनाए रखने के लिए जान की बाजी लगा दी, विजयराघवगढ़ जोड़ने वाली सड़क में इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने कई महीनों अपना आधिपत्य स्थापित किये रहे।

 

इस पूरे स्वतंत्रता आन्दोलन में सरजू सिंह जी के साथ विभिन्न सरदारों ने अपना योगदान दिया, जिसमें सरदार कृपाबोल, चंदन चाचा, बहादुर खाँ, वीरा नयनी, सरदार रामबोल, ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी। ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह जानकारी मिलती है कि राजा सरजू प्रसाद सिंह जी के साथ, राजा छतर सिंह, बुटई सिंह, मुकुंद सिंह, लाल गंजन सिंह, बखतावर बहेलिया, रामप्रसाद पहलवान जैसे महारथियों ने विजयराघवगढ़ को चारो तरफ से बचाने का अंत तक प्रयास करते रहे।
अंग्रेजों और आसपास की रियासतों की सेनाओं ने अंततः विजयराघवगढ़ को अपने कब्जे में अंततः ले लिया:―

 

 अंग्रेजों और आसपास की रियासतों की सेनाओं ने अंततः विजयराघवगढ़ को अपने कब्जे में अंततः ले लिया, बागियों को गिरफ्तार कर लिया गया, और कटनी में कंपनी आफिस के सामने उनके शरीर को जमीन में गाड़कर दिन भर सूरज की तपन के कष्ट के बाद सूर्यास्त के समय मौत के घाट उतारकर बर्बरता का परिचय, सिर्फ उनका कुसूर यह था कि वो अपने राजा सरजू प्रसाद सिंह का पता नहीं बताकर वफादारी का सबूत पेश किये थे।

इलाहाबाद के पास उन्होने आत्मघात कर लिया और अपने को जीते- जी अंग्रेजों के हाथो में नहीं सौंपा:―

इधर सरजू प्रसाद सिंह परिवार और उनके कुछ सरदार विजयराघवगढ़ से दूर अनजान स्थान पर चले गए और स्वतंत्रता की रणनीति बनाते रहे। किंतु सन अठारह सौ तिरसठ में उन्हे नागौद के पुलिस इंसपेक्टर मुहम्मद रजा ने बरौंधा से गिरफ्तार कर लिया, बाद में उन्हे रंगून ले जाते की नीति बनी पर इलाहाबाद के पास उन्होने आत्मघात कर लिया और अपने को जीते- जी अंग्रेजों के हाथो में नहीं सौंपा। इस घटना का जिक्र डॉ. रामनारायण यादव ने अपनी पुस्तक में किया है।

 

इधर विजयराघवगढ़ में अधिकार जमाने के लिए नागौद, मैहर, रीवा की रियासतो के द्वारा अंग्रेजों को पत्रचार प्रारंभ कर दिये गए। किंतु अंग्रेजों ने इस स्थान को अपने ही कब्जे में रखा। सरदार कृपाबोल और रामबोल नाम से तोपें आज भी कैमोर में और रीवा के किले में मिलेंगी। अहीर बालिका वीरानयनी के बलिदान को श्यामनारायण मिश्र जी ने अपने काव्य संग्रह में मार्मिक ढ़ंग से उकेरा।

 ठाकुर सरजू प्रसाद जी के पुत्र ठाकुर जगमोहन सिंह जी बाद में देश से हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध हुए, बाद में विजयराघवगढ़ कटनी में मिला लिया गया। आज भी विजयराघवगढ़ किले की दीवारों में आजादी के दीवानों की चीखें और सहादत दफन है, आज भी उस किले के अंदर प्रवेश करने पर बहुत से अहसास महसूस होते रहते हैं। आजादी के दीवानों की कोशिश और राजा सरजू प्रसाद सिंह जी का जननायक के रूप में अंग्रेजों की नीचतापूर्ण कार्य को जिस तरह से मुंह तोड़ जवाब दिया गया वह इतिहास की तवारीखों में अमर हो गया। उनकी शहादत आज भी विजयराघवगढ़ की गलियों, कूचों, इमारतों में दबी हुई है।

 

राजा साहब हमेशा अमर रहे:― 

विजयराघवगढ़ के आसपास, कटनी और मुरवारा में इस स्वतन्त्रता संग्राम के अवशेष आज भी मौजूद हैं। राजा साहब हमेशा अमर रहे, वो अपने जिंदे जी विजयराघवगढ़ को अजेय ही रखा और अपने पिता राजा प्रयागदत्त जी के दिए गए नाम को सार्थकता प्रदान की उनके साथ हर जाति धरम के आजादी के दीवाने मातृभूमि की रक्षा के लिए चल पड़े, स्त्री पुरुष, हिंदू मुसलमान, लड़के लड़कियाँ सबने जन आंदोलन में अपनी आहुति दी।

कहने को बहुत कुछ है जो मैने अपनी पुस्तक अमर शहीद जननायक राजा सरजू प्रसाद सिंह पर विस्तार से लिखा है। फिलहाल इन्हीं शब्दों से अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूँ। विजयराघवगढ़ वो स्थान बना जो सरजू सिंह जी के जीवित रहते अविजित गढ़ बना रहा जिसमें राघव जी की कृपा बरसती रही। आजादी के इस अमृत महोत्सव में मै उनकी शहादत और उनके साथ प्रतिभागिता किये हुए हर बलिदानी को श्रद्धापुष्प समर्पित करके श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

―अनिल अयान 

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