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नौवीं सदी के द्वार की प्रतीक्षा….!

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नौवीं सदी के द्वार की प्रतीक्षा..!

~ विजय मनोहर तिवारी

अब न मंदिर है। न गर्भगृह। न देवता। केवल द्वार ही शेष है। अत: उसके भीतर जाना कहीं नहीं है। वहां अब केवल शून्य है। किसी समय इस द्वार से नामालूम कितने लोग कहां-कहां से आकर मंदिर में प्रवेश करते रहे होंगे।

जब आप द्वार पर जाकर बैठेंगे तो सामने जो दिखाई देगा, वह आपको हिलाकर रख देगा। इस परिसर में किसी समय कुछ ऐसा घटा है, जिसकी कहानी इस द्वार पर मौन बैठकर ही देखी, सुनी और समझी जा सकती है। लगता है मानो द्वार बचा ही इसलिए रह गया ताकि वह अपनी कथा के लिए हमारी प्रतीक्षा कर सके। वह साक्षी भी है। भुक्तभाेगी भी। उसके पास सामने की तरफ एक महत्वपूर्ण  संकेत है।

सबसे पहले लोकेशन नोट कर लीजिए- यह मध्यप्रदेश में विदिशा जिले के एक सुदूर कोने में पठारी नाम के विकासखंड में बड़ोह नाम के गाँव में बिखरी विरासत का एक हिस्सा है। राजधानी भोपाल से सिर्फ ढाई घंटे की सुविधाजनक दूरी पर।

यह गडरमल का मंदिर है। पुरातत्व विभाग के सूचनापट के अनुसार किसी गडरिए ने इसका निर्माण कराया था इसलिए नामकरण गडरमल है। कुछ नहीं कह सकते। यह संभव है भी और नहीं भी। इसी इलाके में पिसनहारी नाम के मंदिर भी हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि अनाज पीसने वाली किसी धर्मपारायण महिला ने अपने जीवन भर की जमा जोड़ से मंदिर बनवाया। आस्थावान भारत में सब कुछ संभव है।

गडरमल का यह मंदिर नौवीं सदी का है। एक झटके में आप 1200 साल पीछे चले जाते हैं। बहुत संभव है कि दो-चार सौ साल और पहले का हो।

द्वार के अवशेष के आधार पर पुरातत्व के आचार्य डॉ. नारायण व्यास ने चार महत्वपूर्ण सूचनाएं दी हैं।

एक-यह विष्णु मंदिर का प्रवेश द्वार है, दो-दाएं और बाएं गंगा और यमुना प्रतिमाओं से झांक रही हैं,

तीन-द्वार के ऊपर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों हैं और चार- विष्णु के दोनों और नवग्रह और सप्त मातृकाएं अंकित हैं। वह पाषाणों पर जैसे मधुर गीतों का रचनाकाल था।

 

अगर यह विष्णु मंदिर है तो अवश्य ही इसका कालखंड परमारों से पाँच सौ साल और पीछे होना चाहिए। गुप्त साम्राज्य तक। मगध से राज करने वाले गुप्तों तक जाने का अर्थ है 1500 साल पीछे। गुप्त सम्राट विष्णु के उपासक थे और विष्णु के अवतारों पर उनके अद्वितीय स्थापत्य हैं। गांव-गांव में उनकी प्रतिमाएं हैं।

गडरमल के इस द्वार पर इतिहास जैसे बोल उठता है। ऊपर से नीचे और दाएं से बाएं तक उसके हर कोने का हरेक पाषाण आपसे कुछ कहने लगता है। सबके पास कुछ न कुछ कहने को है। वे खींच-खींचकर आपका ध्यान अपनी ओर लाने लगते हैं। कभी आप इसे देखते हैं, कभी उसे सुनते हैं और फिर कहीं आगे या पीछे से कोई आवाज आने लगती है।

थोड़ी देर ध्यानपूर्वक उन्हें सुनने और देखने के बाद एक बात स्पष्ट हो जाती है और वो ये कि ये वो मूल मंदिर नहीं है, जो पहली बार बनकर श्रद्धालुओं के लिए खुला होगा। वह मंदिर बुरी तरह ध्वस्त हुआ है। सारी प्रतिमाएं, स्तंभ और कलात्मक शिलाखंड मलबे का ढेर बन गए थे। आप प्रतिमाओं को गौर से देखने पर स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं कि यह किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार नहीं हुआ था। उन्हें खंडित किया गया है। विशाल मंदिरों को ढहाना भी एक बड़ा काम था, जबकि हर मूर्ति को क्षत-विक्षत करना हो। तब भीतर लकड़ी, रुई, घी, सब तरह की ज्वलनशील सामग्री और बारूद भरकर विस्फोट से उड़ा दिया जाता था। ऐसा ही कुछ यहां हुआ है। गडरमल के पाषाण आज भी वह शोकगीत सुनाते हैं।

मगर इसमें भी नया कुछ नहीं है। शताब्दियों तक अगर कलात्मक सृजन अनवरत रहा तो आगे की शताब्दियों में विध्वंस भी कम नहीं हुआ। सोमनाथ से लेकर वाराणसी तक विध्वंस के बाद पुननिर्माण के अध्याय जुड़े हैं। अयोध्या में पाँच सौ साल बाद जो हो रहा है, गडरमल मंदिर में वह तत्काल कर दिया गया था। इसीलिए यह मंदिर कुछ खास इशारे करता है। यहां कुछ ऐसा है, जो ऐसी ही किसी दूसरी जगह पर इतना विस्तृत और इतना स्पष्ट शायद न हो।

एक बार मलबे के ढेर में बदलकर जब आततायियों के जत्थे-जमातें आगे बढ़ गए तो उसके फौरन बाद यहां हजारों लोग जुटे होंगे और इसके पहले कि वह मलबा धूल और मिट्‌टी के टीले में गुम जाए, एक-एक पत्थर, एक-एक स्तंभ, एक-एक टूटी-फूटी मूर्ति को किसी मशीन के कलपुर्जों की तरह इकट्‌ठा किया गया और यह काम उन्हीं कुशल शिल्पियों के हाथों से किया गया, जिन्हें ऐसे मंदिर बनाने की महारत हासिल थी।

वे उन्हीं शिल्पियों के वंशज रहे होंगे, जिन्होंने यहां शताब्दियों तक ऐसे मंदिर बनाए थे।

 

आज यह कहना कठिन है कि मूल मंदिर किस समय किसने बनवाया था और पहली बार उसे कब और किसने नष्ट किया था। हालांकि दस्तावेजी प्रमाण हैं कि इस क्षेत्र में दिल्ली पर काबिज तुर्क मुस्लिम लुटेरों का पहला भीषण आक्रमण 1234-35 में इल्तुतमिश का है। फिर खिलजियों, तुगलकों और मुगलों ने भी आक्रामक और अनूठी मजहबी सेवाएं लगातार दी हैं।

अगर यह मान लिया जाए कि वह 1234 के ही हमले में ध्वस्त हुुआ तो भी कम से कम तीन सौ से चार सौ साल तक रौनकदार रह चुका था।

एक बार ध्वस्त होने के तुरंत बाद ही गडरमल में देखते ही देखते मलबे से मंदिर ऊपर उठाना शुरू किया गया। चारों तरफ के घेरे में वे पत्थरों को जमाते चले गए। अब ये वही पत्थर वैसे ही नहीं थे, जैसे गिराए जाने के पहले थे। अब यह कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा थे। अंतत: वे लोग मंदिर को उसकी पूरी ऊंचाई तक उठाकर ले गए। ऐसा करने में उन्हें उतना ही समय लगा हाेगा, जितना एक बार पत्थर तराशे जाने के बाद नए मंदिर को उठाने में लगता है। मंदिर तो बन गया मगर देवता का विशाल और ऊंचा गर्भगृह रिक्त ही रह गया। संभवत: मूल देव प्रतिमा को बुरी तरह खंडित करके कहीं फैंक दिया गया होगा।

इस द्वार से मंदिर ऐसा दिखाई देता है, स्थानीय समाज ने जिसका जीर्णोद्धार किसी चुनौती की तरह किया। हर पत्थर मलबे में से निकला है। वह मूल मंदिर में कहां और किसके साथ जुड़ा रहा होगा, यह एक पहेली है। हर पत्थर एक बड़ी पहेली का हिस्सा है। ऐसी विचित्र संरचना इस क्षेत्र में यह अकेली नहीं है। पास ही 24 तीर्थंकरों का एक परिसर बिल्कुल इसी की तरह मलबे में से खड़ा किया गया एक और जराजीर्ण चमत्कार है।

बहुचर्चित पठनीय पुस्तक – हिन्दुओं का हश्र .. 

https://garudabooks.com/hinduon-ka-hashra-itihaas-se-gaayab-ankahi-kahaniyan-bharat-me-islam-1

जब आप गडरमल मंदिर के प्रांगण से सामने देखेंगे तो आधा किलोमीटर से कम दूरी पर पहाड़ी के नीचे वह जैन मंदिर दिखाई देगा। यहां-वहां निगाह करेंगे तो उसी कालखंड की कुछ और पाषाणनिर्मित संरचनाएं दिखाई देंगी। जैसे कई खंभों पर खड़ा एक भव्य मंडप, जिसके बारे में आपको बताया जाएगा कि नवाब साहब यहां मनोरंंजन के लिए आया करते थे। पठारी अपने इतिहास के अंतिम समय में किसी नवाब के कब्जे में रहा है। 1500 साल पुराने इन विस्मृत अध्यायों पर हमारी स्मृतियों में यह नवाबों की ताजा मुहर है। यही हमारा दयनीय इतिहास बोध है।

गडरमल का लैंडस्केप एक ऐसे जलाशय का है, जिसके चारों तरफ गडरमल जैसे मंदिर बनाए गए थे। जलाशय सूख चुके हैं। एक ओर मनोरम हरियाली और पहाड़ी से सुरक्षित यह पूरा विशाल परिसर कभी एक ऐसे यात्रा मार्ग पर रहा होगा, जो विदिशा और उज्जियिनी को प्रयागराज, कौशांबी, वाराणसी और पाटलिपुत्र से जोड़ता था। अलेक्झेंडर कनिंघम ने पठारी से नौंवी सदी के कुछ शिलालेख प्राप्त किए।

यह आवश्यक नहीं है कि ऐसे भव्य मंदिर केवल राजाओं के द्वारा बनवाए जाते थे। उदयपुर में एक ऐसी विशाल बावड़ी है, जिसे मथुरा के एक सेठ हरिदास के सुपुत्र दामोदरदास और गोकुलदास ने 1634 में बनवाई थी। तब उदयपुर भी यात्रा मार्ग पर एक प्रमुख संपन्न नगर था, जहां से तीर्थयात्रियों, व्यापारियों और सेनाओं के काफिले गुजरा करते थे। तब के संपन्न और दानवीर सेठ रास्तों पर छायादार पेड़, जलस्त्रोत और मठ-मंदिर बनवाना अपना धर्म समझते थे।

संभव है गडरमल नाम के कोई सेठ ही रहे हों, जो सिर्फ अपने नाम की वजह से सदियों बाद गडरिया मान लिए गए हों। असल इतिहास समय की कई परतों के नीचे समाया हुआ है, जिन पर धूल के अंबार लगे हैं।

यहां किसी राजवंश की कोई राजधानी नहीं थी। मौर्य, गुप्त और दिल्ली के चौहानों के समय स्थानीय सामंत राज करते थे। परमारों के समय उनके सामंत और मुस्लिम कालखंड में लगातार हमलों के शिकारी झपट्‌टों के बाद आखिर में किसी नवाब के कब्जे की कहानी। यह यात्रा मार्ग का एक शानदार पड़ाव था, जहां राज्यों के प्रतिनिधि, तीर्थयात्री और व्यापारी, संतों और शिल्पी और सैन्य टुकड़ियों के आवागमन रहे होंगे।

मैं मानता हूं कि इतिहास को पूरा समझने के लिए उसके सन्नाटे को भी सुना जाना चाहिए और वह भी पढ़ा जाना चाहिए, जो किसी शिलालेख पर नहीं है, क्योंकि खंडित हों या साबुत पत्थर बिल्कुल झूठ नहीं बोलते। न अयोध्या में, न वाराणसी में, न मथुरा में, न उदयपुर में और न बड़ोह में!

बड़ोह के इस एकाकी द्वार के पास इतिहास की एक सच्ची कहानी है।

~विजय मनोहर तिवारी

( ( म.प्र. सूचना आयुक्त ,वरिष्ठ पत्रकार एवं भारतीय धर्म – संस्कृति – इतिहास के अध्येता एवं मर्मज्ञ)

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