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मुस्लिमों को अपनी जड़  मुगल में नहीं ; भारत की परंपरा में ढूंढनी चाहिए 

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मुस्लिमों को अपनी जड़  मुगल में नहीं ; भारत की परंपरा में ढूंढनी चाहिए 

~डाॅ. पवन विजय
प्रायः मुस्लिम अपनी पहचान डकैत मुगलों से जोड़ते हैं, यही उनकी समस्या की जड़ है। इसलिए भारत का आम हिंदू जनमानस उनसे कट रहा है। मुगलों को लेकर सेक्युलर्स, लिबेरल्स, वामी, और तालिबानी मीडिया गैंग एक सवाल करते हैं कि मुगल तो यहीं बस गए थे, उन्होंने अंग्रेजो के जैसे लूट कर अपना देश नही भरा। यहाँ की चीज यहीं रही। वे लुटेरे कैसे हुए बल्कि वे तो भारत के निर्माता थे।
भारत के निर्माता मुगल थे कहने वाले मार्क्सवादी अपने बाप कार्ल मार्क्स के साथ धोखा करते हैं। वह ऐतिहासिक भौतिकवादी सिद्धांतों को भूल जाते हैं, खैर धोखाधड़ी तो इन लोगों के रग रग में है वापस अपने मुद्दे पर आते हैं। भारत मुगलों से पहले सुशिक्षित, सुसभ्य, सम्पन्न और समृद्ध देश था। ये लुटेरे लूटने के लिए अपनी बंजर भूमि छोड़कर आये और यहां पीढ़ियों लूटकर्म में रत रहे।
अगर हम लूट का माल देश मे है इसलिए वह लूट नही है वाले तर्क का इस्तेमाल करें तो देश मे जितने डकैत चोर उचक्के हैं उन सबको भारत का निर्माता घोषित कर देना चाहिए क्योंकि वे डकैती से प्राप्त माल कहीं बाहर एक्सपोर्ट नही कर रहे बल्कि देश मे ही निवेश कर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे। इन्हें तो भारत रत्न मिलना चाहिए। कितना वाहियात तर्क है। 
मुगलों की लूट को लूट न मानने वाले भूल जाते हैं कि यहां की अधिसंख्य जनता को अपने धर्म का पालन करने के लिए भी पैसा देना पड़ता था, जजिया लूट का घृणितम तरीका था। जिस राज्य पर मुगल आक्रमण करते थे वहां क्या कुछ छोड़ देते होंगे? एक सजीव उदाहरण देता हूँ शायद लोगों की आंख खुल जाए। महाराणा और वहां के लोग जो अपने मेवाड़ को बचाने के लिए घास की रोटी खाने पर विवश हो गए, वहां के राजपूत आज भी उस दरिद्रता से निकल नही पाए और आज भी यायावरी की जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं। यह लूट का जीता जागता उदाहरण नही है क्या?
महिलाओं की लूट मुगलों का प्रिय कर्म था। बाबर ने 1528 में हिन्दू मंडाहरों को लूटने के लिए चढ़ाई की जिसने उस इलाक़े के हिन्दुओं पर जमकर ज़ुल्म ढाया। मंडाहर बस्ती को जमींदोज कर दिया गया। हथियाई गई हिन्दू महिलाओं में से 20 को छांटकर बाबर ने स्वयं के लिए रख लिया व बाकी उसने अपने साथियों में बांट दी । अहमद यादगार लिखता है कि हिन्दू मंडाहर पुरूषों को ज़मीन में आधा दफ्न कर तीरों से मारा गया था और उनकी स्त्रियों को फौज में बांट दिया गया । जनवरी 1624 में जहांगीर अपनी आत्मकथा में जाटों के लिए तिरस्कारपूर्ण संबोधन का प्रयोग करते हुए बताता है कि उसने उन्हें दबाने के लिए फौज भेजी। इसी प्रकार अपनी आत्मकथा में पृष्ठ संख्या 285 पर वह लिखता है कि, 1634 में भेजी गई एक मुगल फौज ने आगरा क्षेत्र में 10000 जाट पुरूषों को मार डाला व उनकी महिलाओं को “संगणना से परे” संख्या में बंदी बना लिया गया।
1619 में, कालपी कनौज के चौहान राजपूतों ने विद्रोह कर दिया था। जिसे दबाने हेतु अब्दुल्लाह खान नामक एक उज़्बेक मुसलमान आप्रवासी सैन्य अधिकारी को फौज सहित भेजा गया। हिन्दू वीरों ने भरपूर मुकाबला किया, लेकिन मुगलों की ज़्यादा तादाद, बेहतर बख्तर व बंदूकों के सामने वह जीत न सके। हिन्दू किले के जीते जाने से पहले कुछ कठिन लड़ाई हुई, जिसमें 30,000 हिन्दू यौद्धा मारे गए । 10,000 सिर काट कर 20 लाख रुपयों के लगभ लूट की गई ।
इसके बाद 1632 में एक अंग्रेज़ यात्री पीटर मुंडी भी इसी क्षेत्र से गुजरने के 4 दिनों के दौरान उस ने 200 मीनार या खंभे देखे, जिन पर कुल 7,000 कटे इंसानी सिर चिन दिए गए थे । इसे मुंडी अब्दुल्ला खान और उसकी 12,000 घोड़े और 20,000 पैदल मुग़ल सेना का कारनामा बताता है | मुंडी के अपने शब्दों में, “उसने सभी को नष्ट कर दिया उनके शहर, उनके (हिन्दुओं के) सभी सामान लूट लिए गए, उनकी पत्नियों और बच्चों को गुलाम बना लिया गया, और उनके पुरूषों के सिर काट काट कर मीनारों में चिनवा दिए गए” । किसी मुगल द्वारा यह पूछे जाने पर की उसने कितने काफिरों को मौत के घाट उतार दिया होगा, अब्दुल्लाह खान ने जवाब दिया, “इतने कटे हुए सिर होंगे कि आगरा से पटना तक दो कतारों में लगाए जा सकें”।
चार महीने बाद जब पीटर मुंडी इसी रास्ते पटना से आगरा आया, तो उसने देखा कि हर मीनार पर 2,100 से 2,400 कटे हुए हिन्दू सिरों के साथ 60 नई मीनारें बना दी गई हैं और नई मीनारों का निर्माण अब तक रुका ही नहीं था। डच इतिहासकार डर्क कोफ बताते हैं कि मुगल काल में हर वर्ष हजारों हिन्दू किसानों को गुलाम बनाकर मध्य एशिया में बेचे जाने के अकाट्य सबूत हैं ।
दरअसल , मुगल अभिजात्य वर्ग हिन्दू किसानों से कर वसूली निर्दयता से करता था। किसी साल फसल खराब होने की सूरत में भी कर कम नहीं होता था और किसानों को अपनी पत्नियों, बच्चों व खुद को बेच कर उसे चुकाना पड़ता था। जो अपने परिवारों को बेचने को तैयार नहीं होते थे, उनके साथ वैसा व्यवहार किया जाता था जैसा कि ऊपर वर्णित है।
चित्तौड़ के तीसरे शाके के बारे में कई हिन्दू जानते ही हैं। जब किले की रक्षा में जुटे 8,000 राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए व उनकी महिलाओं के राख बने जिस्म देखकर भी जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने हुक्म दे दिया कि किले में कत्ल ए आम किया जाए। 40,000 बेकसूर हिन्दू पुजारियों, किसानों, काश्तकारों व व्यापारियों को बेरहमी से काट दिया गया। उनके परिवारों को गुलाम बना लिया गया।
औरंगजेब ने लगभग सभी मंदिरों को नष्ट करने के आदेश दिए ताकि मंदिरों के पैसे की लूट से मुगल दरबार की तामीर की जा सके। और हां मुगलों की लूट का एक बड़ा हिस्सा मध्य एशिया बड़ा भेजा जाता रहा। यह हिस्सा धन, गुलाम और वस्तुओं के रूप में था। 

मुगल डकैत ही थे निर्माता नही। इस लेख में कुछ संदर्भ इसलिए लिए गए ताकि तथाकथित कहानीबाज इतिहासकारों को थप्पड़ लगाया जा सके जो ‘एक अनुमान के आधार पर’ पूरा इतिहास लिख देते।
जब तक यह बात मुस्लिम नही समझेगा तब तक उसकी समस्या खत्म होने वाली नही।
~डाॅ. पवन विजय

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