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नालन्दा से हमने क्या सीखा…!?

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नालन्दा से हमने क्या सीखा…!?

~राजकिशोर सिन्हा

किशोरावस्था में हमने पढ़ा था – “विश्व में जब कहीं युनिवर्सिटी का नाम भी नहीं था तब बिहार में नालन्दा युनिवर्सिटी थी।”

नालंदा विश्वविद्यालय के नवनिर्माण के समाचार मिले थे, कि इसका नया कैम्पस 456 एकड़ में तैयार हो गया है और इसके गौरव को पुन: स्थापित करने का प्रयास किया गया है, संबंधित फोटो भी अनेक मित्रों ने साझा की थी।

नालन्दा विश्वविद्यालय कभी सम्पूर्ण विश्व के लिए ज्ञान का केन्द्र था लेकिन 1193 में बख्तियार खिलजी ने इसका विध्वंस कर दिया था। तब यहाँ इतनी पुस्तकें थीं कि यह विश्वविद्यालय कई महीनों तक जलता रहा था, ये सब बातें इतिहास में अंकित हैं और वैश्विक पटल पर सर्वविदित भी हैं।

नालंदा विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा दोष यह था:

नालंदा विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा दोष यह था कि इसमें शास्त्र तो बहुत पढ़ाए जाते थे लेकिन अस्त्र-शस्त्र और युद्ध-कला-कौशल की शिक्षा नहीं दी जाती थी, जिसका भयंकर दुष्परिणाम यह हुआ कि मात्र ढाई सौ लुटेरों सहित बखितयार खिलजी ने पूरे विश्वविद्यालय का विध्वंस कर दिया। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार, इस विश्वविख्यात विश्वविद्यालय में दस हजार से अधिक छात्र पढ़ते थे और अध्यापकों की कुल संख्या लगभग दो हजार थी। करीब तीन सौ छात्रावास भवन थे। रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक नामक तीन विशाल पुस्तकालय भवन थे। इन पुस्तकालयों में विविध विषयों पर नाना प्रकार के ग्रंथ उपलब्ध थे।

इस प्रकार केवल छात्र और अध्यापक ही मिलाकर बारह हजार हो गए, इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय के कर्मचारी और अधिकारी भी रहे होंगे।

घोर आश्चर्य और दुःख का विषय यह है कि विश्वविद्यालय का विध्वंस करने के साथ-साथ हजारों छात्रों और शिक्षकों की निर्मम हत्या भी कर दी गई! आखिर ऐसा कैसे सम्भव हो सका था? खिलजी के साथ तो केवल ढाई सौ लोग ही थे। विश्वविद्यालय के बारह हजार छात्रों-अध्यापकों सहित कर्मचारियों आदि ने मिलकर यदि एक-एक ईंट भी उठाकर मार दिया होता तो खिलजी और उसके साथियों में से एक भी जीवित बचकर नहीं जा सकता था। आखिर उतने बड़े क्षेत्रफल में फैले विश्वविद्यालय में लाठी, खुरपी, खनती, कुदाल, गड़ासा, लोहे की रॉड, पत्थर आदि कुछ तो होंगे ही न! आत्मरक्षार्थ इनका उपयोग यदि किया गया होता तो वह अनिष्ट नहीं हुआ होता जो हुआ।

तो ज्वलंत प्रश्न यह है कि क्या नालंदा विश्वविद्यालय के नए कलेवर में उपरोक्त महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखा गया है?

एक और बहुत आवश्यक बात –

किसी विश्वविद्यालय की महिमा केवल उसके भवनों की संरचना या भव्यता या स्थान की भव्यता आदि से नहीं होती। उसका महत्व वहांँ पढ़ा रहे आचार्य या शिक्षकों या गुरुजनों और उनके द्वारा पढ़ाए जा रहे पाठ्यक्रम, पाठ सामग्री और उस सामग्री के स्तर पर निर्भर करती है। नालन्दा विश्वविद्यालय में अभी जिन विषयों की पढ़ाई हो रही है, उन विषयों में भारतीय शास्त्रों की प्रामाणिक जानकारी है या नहीं? और उन विषयों में विगत 100 वर्षों में यूरोप में अगर कुछ काम हुआ है तो उसकी प्रामाणिक जानकारी है या नहीं?, और कहीं दोनों में घालमेल तो नहीं किया जा रहा है?

इसके साथ ही वर्तमान में जो भारतीय समाज है ,उसमें समाज की इकाइयां क्या है?,राज्य से उस समाज का संबंध क्या है?, वर्तमान संविधान की वैधता का आधार क्या है? और राज्य को जितनी शक्ति अचानक दे दी गई है उसका भारत के शास्त्रों के संदर्भ में क्या स्थान है?, क्या स्थिति है?,

यह सब बातें अगर कोई विश्वविद्यालय नहीं बताता अथवा समृद्धि एवं ऐश्वर्य के विषय में भारतीय मानक और वर्तमान सामाजिक जीवन तथा अंतरराष्ट्रीय परिवेश, इन के विषय में नहीं बताता अथवा साहित्य की विराट भारतीय परंपरा और विगत 100 वर्षों में यूरोप में विकसित साहित्य शास्त्र, दोनों का सम्यक ज्ञान अगर कोई विश्वविद्यालय नहीं देता और अगर वह दोनों में कोई घालमेल करता है तो वह विश्वविद्यालय नहीं, भ्रांति का बहुत बड़ा केंद्र है। इस तरह के केंद्र वहाँ पढ़ने वाले विद्यार्थियों के साथ न्याय नहीं कर रहे होंगे और इसलिए उन्हें ज्ञान का केंद्र नहीं कहा जा सकता।

अतीत में नालन्दा के साथ, नालन्दा में, जो अशुभ-अनिष्ट हुए, क्या उनसे हमने कुछ सीखा है ताकि वे ऐतिहासिक गलतियाँ भविष्य में दुबारा न हों? नालन्दा का पुनरोदय हमारी उन्नति का उद्घोष है परन्तु बौद्धिकता के साथ आत्मरक्षा का कौशल भी अनिवार्य है, अपरिहार्य है।

क्या भारत के दूरद्रष्टा राजपुरुषों ने इतिहास से कुछ सीखा है? प्राचीन स्मारकों और धरोहरों का रक्षण-संरक्षण सराहनीय कदम है,
परन्तु उन धरोहरों का, अनुरक्षण के नाम पर कलेवर परिवर्तन करके पूर्व ख्याति की पुनर्प्राप्ति के कितने आसार हैं, नये नालन्दा विश्वविद्यालय का चरित्र क्या है, प्रश्न मन में यह है।


– राजकिशोर सिन्हा

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