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राजनैतिक स्टंट के साये में विन्ध्य का पुनरोदय

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राजनैतिक स्टंट के साये में विन्ध्य का पुनरोदय

~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

विन्ध्य के पुनरोदय के लिए राजनीति के अखाड़े में सरगर्मी तेज है। नेतागणों के अन्दर अभूतपूर्व उत्साह और महत्वाकाँक्षाओं के बीज त्वरित ही फलदार वृक्ष में परिवर्तित होने के लिए आतुर हैं। वर्षों से कमरों के अन्दर विन्ध्योदय की क्रान्ति का परचम लहराने वाली समितियाँ अपने -अपने कक्ष से निकलकर रेंगने में जुट गई हैं,और विन्ध्योदय का दम्भ भरने वाले उनके कर्त्ताधर्ता-संयोजक नए-नवेले ठाठ में तनकर अपनी-अपनी सशक्त दावेदारी और श्रेय लेने की प्रतिस्पर्धा में भाग लेने से बिल्कुल भी वँचित नहीं होना चाहते हैं। उनके अन्दर विन्ध्य के पुनरोदय का संकल्प, विन्ध्य की प्राकृतिक,सामाजिक- आर्थिक-राजनैतिक,धार्मिक व सांस्कृतिक वस्तुस्थितियों का भले ही कोई अता-पता न हो। लेकिन सभी के अन्दर मन्त्रिमण्डल में भागीदारी और अपनी-अपनी सशक्त राजनैतिक पहचान बनाने का भूत सर चढ़कर बोल रहा है।

 

मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना:―

 

विभिन्न कुनबों एवं मतभेदों में बँटी हुई ये समितियाँ दावा तो विन्ध्य के पुनर्गठन का करती हैं,लेकिन ये आपस में ही एक मंच या एक स्वर के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हैं। इन सभी की हालत ‘मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना’ जैसी है ; हालाँकि यह तब चल जाता है जब उद्देश्य के प्रति प्रतिबध्दता ,दृढ़संकल्प व इच्छाशक्ति का प्राबल्य हो। किन्तु विन्ध्य के पुनर्गठन के लिए इन सबका कोई स्पष्ट सोद्देश्य समझ नहीं आता है।

Map of vindhy pradesh

सन् उन्नीस सौ छप्पन तक अस्तित्व में रहे विन्ध्य के रीवा, सतना, सीधी, शहडोल,अनूपपुर, सिंगरौली, पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़, निवाड़ी,दतिया और उमरिया में से ― अधिकाँशतः मोर्चा सँभालने का दमखम भरने वालों में से सतना-रीवा के गिने-चुने लोग ही समूचे विन्ध्य के पुनर्गठन का रणक्षेत्र तैयार करने की बात करते हैं। अब इनमें कितना बड़बोलापन है या कितनी सच्चाई ,यह केवल उन्हें और राजनैतिक भाषा समझने वाले नाड़ी ज्ञान में सिध्दस्त विशेषज्ञों को ही पता है।

 

 

हमारा विन्ध्य-हमें लौटा दो :―

‘हमारा विन्ध्य-हमें लौटा दो’ ― का आवाहन करने वाले मैहर विधायक नारायण त्रिपाठी इस अभियान में कूद तो पड़े हैं,लेकिन उनके पास स्पष्ट दूरदर्शी नक्शे का अभाव प्रायः उनके वक्तव्यों और नई-नई बनी हुई सभासद मण्डली के माध्यम से परिलक्षित हो जाता है। नारायण का यह अभियान ऐसा लगता है,जैसे वे सतना लोकसभा की तैयारी करने पर जुटे हैं। संवेदनशील-भावनात्मक मुद्दा होने के कारण जनसमर्थन मिलना स्वाभाविक है।

विन्ध्य के पुनर्गठन के प्रति भाजपा की उदासीनता :―

वहीं उनके दल व वर्तमान सत्ताधारी दल भाजपा में उनकी बातों को गम्भीरता से न लिया जाना,तथा भाजपा के जिम्मेदार पदाधिकारियों द्वारा विन्ध्य की माँग को नारायण त्रिपाठी की व्यक्तिगत माँग व राजनैतिक स्टन्ट घोषित कर देना ; विन्ध्य के पुनर्गठन के प्रति भाजपा की उदासीनता का स्पष्टीकरण देते हैं। रीवा से पूर्व विधायक लक्ष्मण तिवारी और उनके समर्थक इस अभियान में नारायण के साथ दिखते हैं,साथ ही नारायण त्रिपाठी ने कुछ जिलों में इसके लिए संयोजकों सहित अन्य स्थानीय समिति का निर्माण भी किया है। लेकिन उनमें शामिल अधिकाँशतः या तो राजनीति से खारिज़ लोग हैं याकि वे लोग जो राजनैतिक लाईमलाईट में आकर अपनी लॉन्चिंग के माध्यम से ; स्वार्थ सिध्द करने के लिए जुड़ रहे हैं। उनके अन्दर विन्ध्य का नहीं अपितु इसके सहारे किसी भी राजनैतिक दल में प्रवेश करने की जुगत स्पष्ट दीखती है। इन समितियों में ऐसे गिनती के लोग ही शामिल हैं जिनकी स्वच्छ छवि और भावना, वास्तविक विन्ध्योदय के प्रति है।

कटुसत्य तो यह है कि विन्ध्योदय के पुनर्गठन की माँग सतना,रीवा व अधिक हुआ तो सीधी में चलताऊ -शक्ति प्रदर्शन की सभा तक ही सीमित है। कभी नारायण त्रिपाठी अपने ही दल के विरोध में कूद पड़ते हैं,तो कभी उनके दौरे-कार्यक्रमों की स्पष्ट दिशा भी लक्ष्य से भटकती हुई दृष्टिगत होती है।
क्या विन्ध्य का बिगुल केवल शक्ति-प्रदर्शन और अपने वर्चस्व को स्थापित करने का अभियान :―

इन सबके मुख्य केन्द्र में यह है कि विन्ध्य का पुनर्गठन क्या एक व्यक्ति विशेष या श्रेय लेने तथा राजनैतिक वर्चस्व के पाखण्ड के माध्यम से हो पाएगा? क्या बिना वैचारिक प्रतिबध्दता-जनजागरूकता और स्पष्ट-दूरदर्शी रणनीति के बिना विन्ध्योदय का स्वप्न साकार हो पाएगा? सतना-रीवा के अलावा क्या अन्य जिलों में चेतना जागृत किए बिना यह अभियान सफल हो पाएगा? विन्ध्य की भौगोलिक स्थिति व विविध जानकारियों के अभाव तथा एक सीमित क्षेत्र को ही विन्ध्य मानकर ; केवल वहाँ अभियान चलाने से विन्ध्य का पुनर्गठन टेढ़ी खीर ही लगता।

 

क्योंकि जब तक विन्ध्य का समूचा ज्ञान नहीं होगा,और वहाँ के राजनैतिक व सामाजिक तौर पर सक्रिय-निष्क्रिय स्तम्भों को साथ लेकर चलने की दिशा में कदम नहीं बढ़ाए जाते हैं,तब तक विन्ध्य के पुनर्गठन की आवाज़ को राजनैतिक गलियारों में प्रखर स्वर मिल पाना कठिन ही प्रतीत होता है। चूँकि विन्ध्य अपने आप में संवेदनशील मुद्दा है,इसलिए स्वप्रेरणा से भले ही लोग जुड़ जाएँ लेकिन वर्तमान में पृथक विन्ध्य का बिगुल केवल शक्ति-प्रदर्शन और अपने वर्चस्व को स्थापित करने का ही अभियान समझ आता है।

 

 

क्या विन्ध्योदय का संकल्प पुनः मूर्तरुप ले पाएगा:―

पूर्व की भाँति यह भी संभव है कि विन्ध्य के नाम पर राजनैतिक हित अवश्य साधे जा सकते हैं। सत्ता और विपक्ष इस पर अपनी-अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंक सकते हैं।किन्तु विन्ध्य पुनर्गठन को लेकर वर्तमान भाजपा सरकार तो उदासीन ही है,साथ ही काँग्रेस भी इस पर चुप्पी साधे हुए है।

सक्रिय राजनीति में चाहे विन्ध्य के भाजपाई हों या काँग्रेसी हों; सभी विन्ध्य के गठन को लेकर चिरनिद्रा में सोए हुए हैं। हालाँकि यह इसलिए है,क्योंकि सभी किसी न किसी तरह से अपने दल के माध्यम से उपकृत हो रहे हैं याकि उपकृत होते आए हैं।

इसलिए विन्ध्य केवल भावनात्मक सहानुभूति और राजनैतिक स्टन्ट के साये के बीच पेण्डुलम की भाँति लटक रहा है,जिसका समय-समय पर राजनीति के ‘चतुर शिकारी’ – शिकार कर लेते हैं।

लेकिन यह सिलसिला कब तक चलेगा? क्या धरातलीय सच्चाई को स्वीकार किए बिना,और सामञ्जस्य के बिना विन्ध्योदय का संकल्प पुनः मूर्तरुप ले पाएगा।

क्योंकि जब तक यहाँ के नेतागणों में पारस्परिक अपने-अपने बाहुबल के प्रदर्शन और मैं बड़ा-तुम छोटे, मैं क्यों जाऊँगा किसी के पास; सब मेरे पीछे आएँ ― तब तक विन्ध्य पुनर्गठन के गगनभेदी स्वर से राजनैतिक दलों की नींद उड़ा देने का चमत्कार होता हुआ नहीं दिखाई देगा।

मन्त्रियों-सांसदों के मुँह से विन्ध्य के पुनर्गठन को लेकर धोखे! से भी आवाज नहीं निकल पाती है:―

अगर राजनैतिक वस्तुस्थिति की बात करें तो सन् छप्पन तक अस्तित्व में रहे वर्तमान विन्ध्य के जिलों का सरकार में प्रतिनिधित्व – दतिया से राज्य सरकार में गृहमन्त्री नरोत्तम मिश्रा, पन्ना से मन्त्री – बृजेन्द्र प्रताप सिंह,अनूपपुर से मन्त्री – बिसाहूलाल सिंह,सतना से राज्यमन्त्री – रामखेलावन पटेल व रीवा की गुढ़ विधानसभा से विधायक – गिरीश गौतम विधानसभा अध्यक्ष के रूप में हैं।

साथ ही विन्ध्य में लोकसभा की भागीदारी करने वालों में केन्द्र सरकार में टीकमगढ़ से मन्त्री- डॉ.वीरेन्द्र सिंह व सतना से गणेश सिंह, रीवा से जनार्दन मिश्रा , सीधी से रीति पाठक,शहडोल से हिमाद्रि सिंह व खजुराहो से सांसद व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा ;

ये सभी जनप्रतिनिधि विन्ध्य का ही प्रतिनिधित्व करते हैं,किन्तु सदन में इनके मुँह से कभी भी विन्ध्य के पुनर्गठन को लेकर धोखे! से भी आवाज नहीं निकल पाती है।

विन्ध्य की राजनैतिक चेतना सोई हुई है :―

विधानसभा अध्यक्ष निर्वाचित होते ही जब श्री गिरीश गौतम से विन्ध्य के सम्बन्ध में प्रश्न पूँछा गया,तब उन्होंने अपनी ओर से औपचारिकता पूर्ण करते हुए यह कह दिया था कि -‘विन्ध्य प्रदेश बनेगा या नहीं इसका निर्णय यहाँ की जनता करेगी।’ इसका अभिप्राय यही था कि वे इस विषय पर केवल तटस्थ रहते हुए मौन धारण करना चाहते हैं। कुलमिलाकर इन सभी बातों के निष्कर्षतः तौर पर यह स्पष्ट होता है कि विन्ध्य की राजनैतिक चेतना सोई हुई है,और नारायण त्रिपाठी को अपवादस्वरूप छोड़ दिया जाए अन्य सभी जनप्रतिनिधि विन्ध्य के पुनर्गठन को लेकर पूर्णरूपेण अपनी आँख-कान बन्द करके दलनिष्ठा तथा निजी स्वार्थों में संलिप्त रहते हुए अपना-अपना उल्लू सीधा करने पर जुटे हुए हैं।

विपक्ष में भी विन्ध्य के पुनर्गठन को लेकर कोई छटपटाहट नहीं देखने को मिलती है:―

विपक्ष के रुप में सशक्त स्वर माने जाने वाले स्व. श्रीनिवास तिवारी और स्व.अर्जुन सिंह के वंशज भी चुप्पी साधे हुए है ।

चाहे अजय सिंह राहुल हों या पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंह हों याकि श्रीनिवास तिवारी के पौत्र सिध्दार्थ तिवारी हों- इन सबके अन्दर भी विन्ध्य के पुनर्गठन को लेकर कोई छटपटाहट नहीं देखने को मिलती है।

विन्ध्य और विन्ध्यवासी सदैव ठगे के ठगे रह जाते हैं :―

किन्तु इन सभी के राजनैतिक स्टन्ट का दुष्परिणाम विन्ध्य को अपनी दुर्दशा-दुर्गति व संसाधनों, संस्थानों ,रोजगार के बहुआयामी ढाँचों के अभाव,निरंकता रुप में झेलना पड़ता है। विन्ध्य के नाम पर नेताओं के एजेण्डे और उनके स्वार्थ भले ही सिध्द हो जाते हों,किन्तु विन्ध्य और विन्ध्यवासी सदैव ठगे के ठगे रह जाते हैं। और अपनी दुरावस्था-दीनता में ठोकरें खाते हुए जीवन यापन करने के लिए विवश होते हैं,यही कारण हैं कि राजनैतिक षड्यन्त्रों में विन्ध्य छलता हुआ घोर अन्धकार में लुप्त हो चला है!!

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

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