‘स्व’ की त्रयी से विश्वगुरु भारत का आह्वान 

707
0

स्व’ की त्रयी से विश्वगुरु भारत का आह्वान 

~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की त्रयदिवसीय ( 12 – 15 मार्च) बैठक हरियाणा के समालखा पानीपत में सम्पन्न हुई‌।प्रतिनिधि सभा की बैठक में राष्ट्र के सर्वांगीण विकास एवं नवोत्थान के लिए महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित हुए। इन प्रस्तावों में राष्ट्र की समृद्धि एवं चुनौतियों व जनमानस के कर्तव्यबोध को लेकर दूरदर्शी मानचित्र प्रस्तुत किया गया है। प्रतिनिधि सभा में ‘स्व’ त्रयी पर विशेष ध्यानाकर्षित किया गया है। ये ‘स्व’ — स्वधर्म, स्वदेशी एवं स्वराज हैं। अतएव यह आवश्यक हो जाता है कि – स्व की इस त्रयी पर समाज आत्मचिंतन की ओर अग्रसर हो, और समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करते हुए राष्ट्र विश्व नेतृत्वकर्ता के रूप में सामने आए।

जब बात आती है ‘स्व’ के त्रयी की तो – राष्ट्रबोध का इतिहास साक्षी है कि -इसी के द्वारा ही राष्ट्र चैतन्यता की हिलोरें लेकर उठ खड़ा हुआ था। और पूर्वजों के दीर्घकालीन त्याग एवं बलिदान के फलस्वरूप 15 अगस्त 1947 को भारत पराधीनता के पाश से मुक्त हुआ।‌ लेकिन क्या स्वतन्त्रता के बाद – देश के राजनीतिक तन्त्र ने ‘स्व’ की ओर ध्यान दिया? याकि महान पूर्वजों के दिशाबोध को विस्मृत कर दिया? इन प्रश्नों की पड़ताल करने पर निश्चय ही दु:खद पहलू सामने उभरकर आते हैं। लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक अपने प्रारम्भिक समय से ही इस ‘स्व’ के लिए समर्पित रहा आया है‌ । और ‘स्व’ के बोध के साथ व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के ध्येय को लेकर सतत् गतिमान है।

अतएव जब हम स्वाधीनता के अमृत काल में प्रवेश कर चुके हैं। और देश व समाज में पुनश्च राष्ट्रीय जागरण की चैतन्यता का आलोक दिखाई दे रहा है। ऐसे में नितान्त आवश्यकता है कि – ‘स्व’ को ह्रदय में रखकर राष्ट्रोन्नति के पथ की ओर समूचा समाज अग्रसर हो। और शिक्षा, कला, संस्कृति, साहित्य, ज्ञान – विज्ञान, तकनीकी एवं सामाजिक आचरणों के माध्यम से सर्वश्रेष्ठ भारत को गढ़ा जाए।

 

‘स्व’ को लेकर हमारे मन में यह प्रश्न आता है कि — यह ‘स्व’ और स्वत्वबोध क्या है? इसका उत्तर है – ‘स्व’ यानि भारतीय संस्कृति का मूल केन्द्र। यह स्व अर्थात् हमारी महान भारतीय परम्परा के स्वाभिमान का मेरूदण्ड है, जो संसार की किसी भी शक्ति के सम्मुख कभी भी झुक नहीं सकता है।
‘स्व’ का अभिप्राय यानि हमारी सांस्कृतिक चेतना के वे समस्त सर्वोच्च आदर्श जिन्होंने राष्ट्र को जीवन शक्ति दी। और भारत को पुण्य पंथ में बढ़ने की ओर अग्रसर कराया। यह ‘स्व’ वही है जिसकी भावना से स्वातन्त्र्य संघर्ष में समूचा राष्ट्र एक हुआ ।
और हमारे वीर – वीराङ्गनाओ ने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वतन्त्रता की थाती हमें सौंपी।

अतएव उस ‘स्व’ का बोध हमें अवश्य होना चाहिए और ‘मनसा- वाचा – कर्मणा’ हमारे आचरण भी उसी अनुरूप हों।। ‘स्वधर्म’ के विषय में तो श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है —

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।।

अर्थात् — अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए परधर्मसे, गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है । स्वधर्म में मरना भी कल्याणकारक है, लेकिन परधर्म तो भय उपजाने वाला है।

हमारा पथ – राष्ट्र पथ है। हमारा धर्म राष्ट्र धर्म है। अतएव समाज के प्रत्येक कार्य एवं विचार जो राष्ट्र को समृद्ध एवं सशक्त करने वाले हैं, वे सभी स्वधर्म हैं। स्वधर्म का यह संदेश जीवन के विविध स्वरूपों – सामाजिक , आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में लागू होता है। और यही मार्ग श्रेयस्कर भी है।‌‌ ‘स्व’ की त्रयी का तीसरा स्तंभ है ‘स्वदेशी’ — स्वदेशी यानि जो अपने देश का है। जब हम ‘स्वदेशी’ की बात करते हैं तो हमारे ध्यान में आता है कि – हम परतन्त्र भी तो इसीलिए हुए क्योंकि हमने ‘स्वदेशी’ को भुला दिया। और फिर जब ‘स्वधर्म – स्वदेशी – स्वराज’ की भावना जागी तब — हम स्वतंत्र हुए। अतएव ‘स्वदेशी’ में ही समृध्दि एवं शक्ति की कुञ्जी छुपी हुई है, इस मंत्र को हम न भूलें। बात चाहे विचार की हो – व्यवहार की हो – कार्य की हो याकि व्यापार की हो ; इन सबमें स्वदेशी यानि अपने भारतीय मूल्यों एवं परम्पराओं का ध्यान रखना आवश्यक है। जब ‘स्वदेशी’ की भावना से ओतप्रोत होकर हमारे आचार- विचार एवं व्यवहार बनेंगे, तब निश्चय ही हमारा राष्ट्र विश्वगुरु के सिंहासन पर पुनः आरूढ़ हो जाएगा।

संघ की प्रतिनिधि सभा में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि – भारतीय समाज की मूल इकाई कुटुम्ब (परिवार) हैं। उनको सशक्त बनाया जाए। क्योंकि वर्तमान परिदृश्य में आसुरी शक्तियों के सुनियोजित हमले भारतीय समाज संरचना की रीढ़ माने जाने वाले – कुटुम्ब पर हो रही है। भाँति- भाँति के घातक विध्वंसकारी उद्देश्यों के तहत तथाकथित आधुनिकता की चासनी में सिनेमा, विज्ञापन एवं अन्यान्य प्रचार माध्यमों द्वारा परिवारों को लक्षित कर नैरेटिव चलाए जा रहें। ताकि परिवार व्यवस्था के मूल को तोड़ा जा सके। अतएव समाज के समक्ष उपस्थित हो रहे संकटों पर संघ ने समाज प्रबोधन की दिशा में विचार व्यक्त किए हैं।और समाज से आह्वान किया है कि – परिवार के दृढ़ीकरण पर विशेष ध्यान दिया जाए। सामाजिक समरसता एवं बन्धुत्व की श्रेयस्कर भावना के साथ नागरिक कर्त्तव्यबोध की ओर भी ध्यानाकर्षित कराया गया है। ताकि बाह्य एवं आन्तरिक आसुरी शक्तियों द्वारा देश समाज में विखण्डन के षड्यंत्र सफल न हो सकें। और सामाजिक एकता – समरसता की उदात्त भावना के साथ समूचा देश राष्ट्र की प्रगति में योगदान दे सके। क्योंकि सामूहिक एकजुटता के साथ ही राष्ट्र का पुनरोत्थान, नवोन्मेषी विचार दृष्टि एवं संकल्प की शक्ति के साथ फलित हो सकेगा।

प्रतिनिधि सभा के प्रस्ताव में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि – भारत को आर्थिक रूप से सशक्त एवं समृद्ध बनाने में सामूहिक उद्यमों, उद्यमिता के विकास एवं नवाचारों के साथ उद्यम स्थापना किए जाने की आवश्यकता है। इस दिशा में स्वदेशी के मन्त्र को पुनश्च जागृत करने व आत्मसात करने क आवश्यकता है। ताकि भारत की युवा शक्ति की असीम ऊर्जा एवं चेतना के साथ उद्यम, स्वरोजगार एवं उत्पादन प्रक्रिया में भागीदारी के भारतीय चिंतन प्रणाली को मजबूत किया जा सके। और आर्थिक शक्ति के रूप में भारतवर्ष की पुनर्प्रतिष्ठा हो। इसीलिए सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया : की भावना से लेकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की महान अवधारणा एवं पध्दति का अनुकरण करते हुए एक भारत- श्रेष्ठ भारत को गढ़ने की दिशा में अग्रसर होने की आवश्यकता है।

 

प्रतिनिधि सभा में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर घोषित पंच प्रणों के आह्वान को भी रेखांकित एवं आवश्यक बतलाया गया है। ये पंच प्रण हैं— १. विकसित भारत का लक्ष्य, २. गुलामी के हर अंश से मुक्ति, ३. अपनी विरासत पर गर्व करना, ४. एकता और एकजुटता ५ नागरिकों में कर्तव्य की भावना का होना । इसके साथ ही औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, विघटनकारी शक्तियों के षड्यंत्रों को विफल करने और एकजुटता के माध्यम से समाज के सभी वर्गों के उत्थान एवं कल्याण के प्रयास की ओर उन्मुख होने पर बल दिया गया है। और तकनीकी, पर्यावरणीय दृष्टिकोण से विकास को गति तथा आधुनिक ज्ञान- विज्ञान की प्रणाली के भारतीयकरण के माध्यम से कदम बढ़ाने के चिंतन को प्रस्तुत किया गया। राष्ट्र विकास की इसी कड़ी में समाज के संगठन, राष्ट्र की समृद्धि एवं वैभव की पताका फहराने के लिए प्रतिनिधि सभा ने राष्ट्र के समस्त प्रबुद्ध वर्ग , समूचे भारतीय समाज से आह्वान किया है कि — भारतीय चिंतन के प्रकाश में सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, लोकतांत्रिक, न्यायिक संस्थाओं सहित समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में कालसुसंगत रचनाएँ विकसित की जाएं। और राष्ट्र के नवोत्थान के पुनीत कार्य में सभी अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ सहभागी बनें।

 

सार तत्व के रूप में आवश्यक है कि स्वत्व, स्वाभिमान के साथ ज्ञान – विज्ञान तकनीकी में समूचा समाज पारंगत हों। और ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ‘ का उच्चारण करते हुए – भारत की धर्मध्वजा लेकर चल पड़े। ताकि महान पूर्वजों का यह महान राष्ट्र पुनश्च एकत्व साधना,स्वधर्म का पालन करते हुए स्वदेशी की भावना से ओतप्रोत होकर ‘स्वराज’ का शंखनाद गुञ्जित कराने के लिए कृत संकल्पित हो उठे। फिर निश्चय ही वह दिन दूर नहीं होगा जब ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’ की धर्मभूमि भारत की दशों दिशाओं में जय जयकार होगी। और भारत माता के विश्वगुरु के सिंहासन पर विराजमान होते ही ‘जयतु! जय भारती’ के जय गान से विश्व गगन गुञ्जायमान हो उठेगा।

~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here