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रावण भक्ति का बढ़ता अधर्म

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रावण भक्तों ने मण्डोर को रावण पत्नी मन्दोदरी का स्थान मान कर दोनों की पूजा आरम्भ कर दी है। मन्दसौर के भी कुछ लोग अपने को मन्दोदरी वंशज बता रहे हैं। कौशल्या, सुमित्रा, भरत आदि के कोई भक्त नहीं बने। मण्डूर का अर्थ लौह है, उसका मन्दोदरी से कोई सम्बन्ध नहीं है। मन्दोदरी मय दानव की पुत्री थी। मय दानव जाति का क्षेत्र मेक्सिको था जिसे अंग्रेजी में माया सभ्यता कर दिया है। रावण के नाना माली-सुमाली के नाम पर पूर्व अफ्रीका में सुमालिया तथा पश्चिम अफ्रीका में माली देश हैं। रावण भक्ति में पागल लोगों द्वारा ये कथायें फैलायी गयी हैं। रावण भक्ति इसलिए बढ़ रही है क्योंकि हिन्दू धर्म की सभी मान्यताओं का विरोध करना है। वर्णाश्रम धर्म के विरोध के लिए जाति विहीन समाज की कल्पना होती है जो आज तक विश्व में कहीं नहीं हुआ है। भक्ति समाप्त करने के लिए मूर्ति पूजा का विरोध होता है। अहिंसा, अस्तेय आदि को आदर्श कहा गया है अतः लुटेरे तथा नारी अपहरण करने वाले रावण की भक्ति बढ़ रही है। रावण के द्वारा वेद पढ़ने का रामायण में कहीं उल्लेख नहीं है। यदि वह विश्व विजेता था तो विश्व में कहीं तो उसका जीवन चरित होता। राम द्वारा वसिष्ठ के पास वेद पढ़ने का वर्णन है।

वेद पढ़े थे अतः हनुमान को पहचान लिया कि इस तरह की बात वही कर सकता है जो चारों वेदों का विद्वान् हो। यदि रावण भी वेद पढ़ा होता तो हनुमान के वेद ज्ञान का उसे आभास होता। नासमझी के कारण शत्रु की योग्यता कम मानी तथा पराजित हो कर मारा गया। रावण ने विमान भी नहीं बनाया था, पुष्पक विमान कुबेर से धोखे से छीन लिया था। रावण ने तन्त्र साधना की थी तथा माया-युद्ध द्वारा देवों से लड़ने की शक्ति प्राप्त की। राम के पास विश्वामित्र, भरद्वाज तथा अगस्त्य द्वारा अधिक उन्नत दिव्यास्त्र थे, जिनका उत्तर रावण के पास नहीं था।

समुद्र पर सेतु बनाने का कौशल राम दल में ही था। रावण तो विश्वास भी नहीं कर सका कि ऐसा पुल बन सकता है। रावण की महानता की एक और झूठी कथा रची गयी है कि रामेश्वरम में शिव पूजा के लिए उसे पुरोहित बनाया गया था। पर शुक और सारण को जासूसी के लिए भेजने पर भी उसे पुल या राम की सेना के बारे में हवा तक नहीं लगी। शुक तथा सारण तो राम की सेना देखकर पागल हो गये थे तथा सैनिक संख्या १० घात ६५ बता दी, जिसके कारण रावण ने उनको डांट कर भगा दिया।

पूरे सौर मण्डल की मात्रा इलेक्ट्रॉन की इकाई में केवल १०घात ६० है। यदि मनुष्य का भार औसत ६० किलो है, तो १० घात ६५ मनुष्यों का भार पूरी गैलेक्सी (ब्रह्माण्ड) का कोटि गुणा होगा। रावण की एक ही विशेषता थी छल तथा तन्त्र। उसके तन्त्र का प्रचार विभीषण ने किया जिसे उड्डीश तन्त्र कहते हैं। ऋग्वेद के एक छोटे अंश का रावण भाष्य है, पर वह लंकापति रावण का नहीं है।

 

दक्षिण भारत में विशेषकर तमिल लोगों में रावण सभ्यता का आजकल बहुत प्रचार हो रहा है। २००८ में शृङ्गेरी विद्यापीठ में शक तथा संवत्सर पर भाषण के लिए मुझे निमन्त्रित किया गया था। दो प्रकार की काल गणना क्यों होती है, यह समझने की किसी ने चेष्टा नहीं की। तुरंत विरोध हुआ कि मैं राम कल्चर के अनुसार कह रहा हूँ, उनका रावण कल्चर है। संस्कृत विद्यापीठ के प्राचार्य रामानुज देवनाथन जी को संस्कृति कहने में मानसिक कष्ट हो रहा था, अतः कल्चर कहा।

वह जगन्नाथ को भी शबर देवता मानते थे जिसपर हिन्दुओं ने अन्याय पूर्वक अधिकार कर लिया है। शिक्षित लोगों की मूर्खता पर क्रोध होता है। अतः मुझे कहना पड़ा कि आपको तमिल संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं है, न रावण के विषय में। राम-रावण युद्ध शक- संवत्सर विवाद के कारण नहीं हुआ था। रावण ने अपराध किया था जिसका उसे दण्ड देना था। दक्षिण भारत में राव सम्मान सूचक शब्द है जैसे उत्तर भारत में रावल, या भोजपुरी में रवा। जिस मनुष्य में यज्ञ रूपी वृषभ रव कर रहा है, वह राव या रवा है तथा महादेव जैसा है। त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महोदेवो मर्त्याँ आविवेश (ऋक्, ४/५८/३)। तमिल में राव का रावण हो जाता है, जैसे राम का रामन, कृष्ण का कृष्णन आदि।

किन्तु रावण पर आक्रमण तमिलनाडु के रामेश्वरम से हुआ था, अतः वहां राव शब्द का प्रयोग बन्द हो गया। बाकी सभी दक्षिण भारत की भाषाओं में राव है, केवल तमिल को अन-रवा भाषा कहते हैं। अतः वहां रावण सभ्यता नहीं, रावण विरोधी सभ्यता है। इसाई शिक्षा द्वारा रावण भक्ति का प्रचार करने वालों के भी नाम हैं-रामास्वामी नायकर, एम जी रामचन्द्रन, शृङ्गेरी विद्यापीठ के प्राचार्य रामानुज देवनाथन (उनके अनुसार उचित नाम था कुम्भकर्ण असुरनाथन), जयराम रमेश (जयरावण महेश) आदि।

रावण का राज्य बड़ा था। किन्तु वह विश्व विजयी या अजेय नहीं था। वह प्रत्यक्ष युद्ध में अयोध्या, महिष्मती या किष्किन्धा किसी को पराजित नहीं कर सकता था। अतः उसने विश्वामित्र आश्रम बक्सर, दण्डकारण्य, पञ्चवटी आदि में आतंकवादी घुसपैठिए भेजे थे जैसा आजकल पाकिस्तान करता है। रावण को तो दशरथ भी युद्ध में पराजित कर चुके थे जिस युद्ध में कैकेयी भी गयी थी। किन्तु भीतर के घुसपैठियों को प्रत्यक्ष सैनिक युद्ध से नहीं समाप्त कर सकते थे। अतः राम को १४ वर्ष वन में घूमना पड़ा। युद्ध में ३०० राजा राम का सहयोग कर रहे थे जिनको राज्याभिषेक के बाद राम ने विदा किया था। इससे रावण को कठिनाई हो गयी। वह राज्य के विरुद्ध युद्ध लड़ सकता था, पर जंगल में घूमने वाले तपस्वी के विरुद्ध नहीं। युद्ध के लिए असुरों को भी बहाना बनाना पड़ता है।

~अरुण कुमार उपाध्याय
( धर्म दर्शन एवं पौराणिक ग्रन्थों के अध्येता एवं मर्मज्ञ)

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