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तुलसी की श्री‌रामचरितमानस भारतीय पौराणिक संस्कृति का केंद्र बिन्दु

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तुलसी की श्री‌रामचरितमानस भारतीय पौराणिक संस्कृति का केंद्र बिन्दु
सतना | पाठक मंच सतना के तत्वावधान में चौदह अगस्त को दो दिवसीय साहित्य विमर्श वेबीनार का शुभारम्भ किया गया। इस अवसर पर विशिष्ट वक्ता के रूप में सतना के श्री बिहारी रामलीला समाज की रामलीलाओं में रावण अभिनय करने वाले श्री ददोली पांडेय रहे। साथ सभी साहित्यकार साथियों ने तुलसी साहित्य पर अपने विचार व्यक्त किए, इस अवसर पर पाठक मंच जैतवारा से आनंद त्रिपाठी और पाठक मंच रामपुर बाघेलान से विष्णु धर भट्ट ने विचार व्यक्त किए।
रामकथा नटनागर ने कहा तुलसी दास जी ने कौशल्या जी के मातृत्व वर्णन किया और रामवन गमन के पश्चात उनकी प्रतीक्षा प्रेरित करती है। ममता श्रवण अग्रवाल ने राम भरत के जीवन और भाईचारे को सभी के सामने रखा। जमीलुद्दीन सिद्धीकी ने बघेली में तुलसी चरित्र पर कविता पेश की।
उनके गुरु नरहरि दास के बारे में बताया। एस एल प्रजापति ने रामचरित मानस में प्रकृति और मानवीय मूल्यों के बारे में विचार रखे। ऋषिकेश गुप्ता ने रामचरित मानस को जनमानस की पौराणिक आस्था और विश्वास का मार्गदर्शक बताया। धर्मेंद्र सिंह ने सतना जिले की रामलीलाओं के बारे में और चित्रकूट दर्शन पर प्रकाश डाला। हरदा से प्रीतम तनवीर ने श्रीराम और तुलसीदास जी को एक और सेवक के रूप में प्रस्तुत किया। राजधर मिश्र हयात ने रामचरित मानस को समन्वय का मुख्य मार्ग बताया।
इसमें जीवन के व्यापक परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत किया गया है।
अरुण कुमार मिश्र ने संतों और बुजुर्गो के जीवन की तुलना दानशीलता और वृक्षों की जिसे तुलसीदास जी ने कवितावली में रखा है। आनंद त्रिपाठी ने तुलसीदास जी दोहोंं के माध्यम से जीवन दर्शन का उल्लेख किया। विष्णु धर भट्ट ने बाबा तुलसी को भारतीय पौराणिक पात्र प्रणाम राम जी चरित्र को वैश्विक चरित्र निर्माण का मुख्य उद्देश्य के रुप में रखा। गोरखनाथ अग्रवाल ने राम, रामचरित मानस और भगवान राम के मर्यादा पुरुषोत्तम होने तक की यात्रा को अपने शब्दों में व्यक्त किया।
इस अवसर पर रफीक सतनवी, प्रियांशु कुशवाहा, के के सक्सेना, डॉ. ऊषा सक्सेना भी वेबीनार में उपस्थित रहे। अंत में ददोली पांडेय ने बिहारी रामलीला समाज की रामलीलाओं के बारे में‌ बोलते हुए रामचरित मानस को सर्वोत्तम पौराणिक ग्रंथ माना। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर आयोजित होने वाली रामलीलाओं को मानस के केंद्रीय महत्व को जन-जन पहुचाने का सशक्त माध्यम बताया। बाबा तुलसी को बाल्मीकि जी के कार्य को आगे बढ़ाने वाले साहित्यकार और संत के रूप में स्वीकार किया। आभार और संचालन अनिल अयान ने किया।

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