जबलपुर। मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी ‘संस्कार कांवड़ यात्रा’ अपनी भव्यता और आस्था के सैलाब के लिए चर्चा में जरूर आई, लेकिन इसके समापन पर जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने आयोजन समिति के दावों की पोल खोलकर रख दी है। गौरीघाट से पवित्र नर्मदा का जल लेकर 35 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा तय कर जब लाखों श्रद्धालु कैलाशधाम मंदिर पहुंचे, तो उन्हें भगवान भोलेनाथ पर जल चढ़ाने जद्दोजहद करनी पड़ी।
मुख्यमंत्री मोहन यादव से लेकर एमपी कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी सहित कई जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी वाली इस यात्रा में, समिति के लचर प्रबंधों के चलते भक्तों की आस्था कैलाश धाम मंदिर पर दम तोड़ती नजर आई। सवाल यह उठता है कि जब आयोजन समिति को इस विशाल संस्कार कांवड़ यात्रा और कैलाशधाम मंदिर में जुटने वाली भारी भीड़ का अनुमान पहले से था, तो फिर जल चढ़ाने के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए गए? क्या समिति का काम सिर्फ भीड़ जुटाकर अपनी वाहवाही लूटना और राजनीतिक रोटियां सेकना मात्र रह गया था?
पुलिसकर्मी की धक्का मुक्की, नर्मदा जल पैरों में…
हजारों कांवड़िए अपने कंधों पर पवित्र नर्मदा जल लेकर दिनभर पैदल चले, लेकिन समिति की इस लचर व्यवस्था के कारण वे भगवान भोलेनाथ का अभिषेक तक नहीं कर पाए। मंदिर के बाहर भक्तों के हाथों में रखा वह पवित्र जल पैरों में गिरता रहा और व्यवस्था के अभाव में वे बेबस नजर आए। पुलिस और सुरक्षाकर्मियों द्वारा धक्का-मुक्की किए जाने के वीडियो ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक शर्मनाक बना दिया है।
आस्था के साथ खिलवाड़ या सिर्फ राजनीतिक ढकोसला ?
कांवड़ियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। उनका सीधा सवाल है कि जब इतनी दूर पैदल चलकर आने के बाद हमें जलाभिषेक ही नहीं करने दिया गया, तो इस भव्य यात्रा का क्या औचित्य? क्या कांवड़ियों को केवल भीड़ का हिस्सा बनाकर अपनी पीठ थपथपाने के लिए इस्तेमाल किया गया था?
यह सीधे तौर पर लाखों शिवभक्तों की आस्था के साथ खिलवाड़ है। यदि आयोजन समिति पहले से सतर्क रहती और बेहतर तैयारी करती, तो नर्मदा जल का यह अपमान कभी नहीं होता। भव्यता के नाम पर इस साल खोखले दावे करने वाली इस ‘संस्कार कांवड़ समिति’ को जनता से अब शिवभक्त यही सवाल का जवाब पूछ रहे हैं कि आखिर भक्तों की इस दुर्दशा का जिम्मेदार कौन है? क्या यह यात्रा में कावड़िया भीड़ बढ़ाने का सिर्फ़ हिस्सा थे?